जैसे ही हिना अपने कमरे से बाहर निकली, वो एकदम अचानक कबीर से टकरा गई।कबीर—जो शायद बाहर से लौटा था, थका हुआ और किसी उलझन में डूबा हुआ—उसका चेहरा संजीदा और भरा-भरा लग रहा था। उसने हिना की तरफ एक तेज़, मगर बेमानी नज़र डाली — न नफरत, न अपनापन, बस एक थकी हुई बेरुख़ी थी उस आँखों में।हिना का दिल एक पल को काँप उठा।कबीर कुछ बोले बिना, सीधा ऊपर की ओर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।हिना वहीं खड़ी रह गई… जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो।उसके मन में हलचल सी उठी।उसने धीरे से खुद से कहा,”या अल्लाह… यही है वो शख़्स? जिससे मेरी शादी की बात चल रही है?कुछ तो हो जाए… कोई वजह बन जाए… कि बात यहीं रुक जाए…”उसकी आँखों में हल्का सा डर, हल्का सा गुस्सा और एक बेआवाज़ दुआ थी।हिना ने दुपट्टा ठीक किया, और बिना किसी से कुछ कहे, बड़े से हाल से बाहर निकल गई।——पूरी मिर्ज़ा फैमिली डाइनिंग रूम में, डाइनिंग टेबल पर एक साथ बैठी हुई थी।टेबल के एक सिरे पर हाशमी मिर्ज़ा और उनकी बीवी — जिन्हें सब “दादी” कहकर पुकारते थे — अपनी आदत के मुताबिक़ ग़ौर से सबको देख रहे थे।उनके साथ ही उनके तीनों बेटे बैठे थे —सबसे बड़ा बेटा अहमद मिर्ज़ा,उसके बाद सईद मिर्ज़ा,और सबसे छोटा बेटा — वक़ार मिर्ज़ा।अहमद मिर्ज़ा के दोनों बेटे —बड़ा बेटा कबीर, और दूसरा बेटा आयानउसकी बेटी साबिहा,दोनों टेबल पर बैठे हुए थे।सईद मिर्ज़ा का बड़ा बेटा शाहरुख़, जो शहर से बाहर था, वह आज मौजूद नहीं था।उनका छोटा बेटा तैमूर, जो ग्रेजुएशन कर रहा है, वह टेबल पर बैठा हुआ था।उनकी बेटी कहकशां, जो हिना के साथ ही कॉलेज में पढ़ती है, वह भी अपनी सीट पर थी।वक़ार मिर्ज़ा की दोनों बेटियाँ —हिना और हवा —दोनों बैठी हुई थीं।हवा ने हाल ही में कॉलेज जाना शुरू किया है, जबकि हिना फाइनल ईयर में है।तीनों भाइयों की बीवियाँ —सलीमा भाभी (कबीर की अम्मी),शगुफ़्ता भाभी (हिना की अम्मी),और रिहाना भाभी (तैमूर की अम्मी) —तीनों औरतें खाने की सर्विंग में लगी हुई थीं।जैसा हमेशा होता आया था, आज भी उन्होंने डाइनिंग टेबल पर परिवार के साथ बैठकर खाना नहीं खाया।वो तीनों अपनी बेटियों और बच्चों को खाना परोसने में लगी थीं।इस घर की एक परंपरा यही थी — मर्द और बच्चे पहले खाते हैं, और घर की औरतें बाद में, अलग से बैठकर खाना खाती हैं।हालाँकि परिवार की बेटियों को टेबल पर बैठने की इजाज़त थी, मगर बहुएं अब तक उस जगह पर नहीं बैठी थीं।सभी चुपचाप खाना खा रहे थे, क्योंकि सभी — छोटे हों या बड़े — दादा जान और दादी जान से डरते थे।चाहे अब वे लोग बिजनेस शुरू कर चुके थे, और मॉडर्न सोच का हिस्सा बन चुके थे, मगर कुछ रवायतें अभी भी नहीं बदली थीं।दादा हुज़ूर और दादी जान के सामने कोई भी ज़ोर से बोल नहीं सकता था।न ही वह तीनों भाई कभी अपने मां-बाप की बातों का विरोध करते थे।हाँ, इतना ज़रूर था कि बच्चों में नई सोच पनपने लगी थी — जो अब तक सिर्फ़ उनके कमरों के अंदर ही सीमित थी।मिर्ज़ा साहब के सबसे छोटे बेटे वक़ार का स्वभाव अपने भाइयों से बिल्कुल अलग था।उसका मिज़ाज शुरू से ही नरम और समझदार था।उसका स्वभाव खुला हुआ था, और वह औरतों को आज़ादी देने के पक्ष में था।मगर साथ ही वह अपने अम्मी और अब्बा हुज़ूर की बहुत इज़्ज़त करता था।जैसे ही खाना खत्म हुआ और सभी अपनी-अपनी जगह से उठने लगे, दादा जान ने दादी जान की तरफ देखा।फिर उन्होंने बड़े बेटे अहमद से कहा,”अहमद, तुम तीनों भाई ज़रा मेरे कमरे में आना।”🌙 खाने के बाद तीनों भाई उठकर मिर्ज़ा साहब के कमरे में चले गए।वैसे सबको पहले से ही अंदाज़ा था कि किस बारे में बात होने वाली है।कमरे में पहुँचते ही दादा सरकार ने तीनों बेटों की तरफ देखा और गंभीर स्वर में कहा —”मुझे लगता है कि अब कबीर और हिना — दोनों का रिश्ता तय कर देना चाहिए।”अहमद मिर्ज़ा ने थोड़ी देर सोचा और फिर कहा,”अब्बा हुज़ूर, मुझे कबीर से एक बार बात करनी होगी…”वक़ार — जो हिना का अब्बा था — धीमे से बोला,”और मुझे भी हिना से पूछना होगा…””तुम्हें हिना से पूछना होगा?”सईद मिर्ज़ा ने थोड़ा हैरान होकर कहा,”कबीर की बात तो मैं फिर भी समझता हूँ, मगर हिना…? तुम्हारा फैसला क्यों नहीं मानेगी भाई साहब?”वक़ार ने बिना हिचकिचाहट के कहा,”वक़्त बदल चुका है। अब बच्चे अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लेना चाहते हैं। मैं अपनी बेटी की राय लेना ज़रूरी समझता हूँ।””तुम दोनों एक बात भूल रहे हो…”दादा सरकार ने सख़्त लहजे में कहा,”इन दोनों की शादी तो बचपन में ही तय कर दी गई थी। और मुझे नहीं लगता कि अब वो बात टूटेगी। मैं तुम लोगों को पहले ही बता चुका हूँ — इस घर में सारी शादियाँ मेरी मर्ज़ी से होती हैं।”तभी दादी जान बीच में बोल पड़ीं —”ये तो बचपन में ही तय हो गया था… कबीर घर का बड़ा बेटा है, और हिना घर की बड़ी बेटी। तो इन दोनों की शादी ही होगी।”कमरे में कुछ पल के लिए चुप्पी छा गई।रात को वक़ार अपने कमरे में अपनी पत्नी शगुफ़्ता से बात कर रहा था।”तो अब क्या करोगे?”शगुफ़्ता ने अपने शौहर वक़ार से पूछा,”अब हिना से तो बात करनी ही होगी।”मैं मुस्लिम पृष्ठभूमि पर सीरीज लिखने की कोशिश कर रही हूं प्लीज मुझे सपोर्ट करें कमेंट करें लाइक करें और मुझे सजेस्ट भी करें।वक़ार ने धीमे स्वर में कहा,”वैसे कबीर अच्छा लड़का है… ज़िम्मेदार भी है।”शगुफ़्ता ने सिर हिलाते हुए कहा,”वो तो ठीक है… मगर उसकी और हिना की सोच में बहुत फ़र्क है।मेरी हिना हँसती है, मुस्कुराती है, शरारती है… और कबीर?वो तो सिर्फ़ ज़रूरत की बात करता है। घर के सभी लड़के उसके सामने बोलते हुए झिझकते हैं।”वक़ार ने हामी में सिर हिलाते हुए कहा,”बात तो तुम्हारी सही है।एक बात का और भी फ़र्क है… हिना जब ग्रेजुएशन पूरी कर लेगी, ।और कबीर… उसने बिज़नेस तो बहुत अच्छे से संभाला है, मगर एजुकेशन दिमाग खोलती है।वो जो बात पढ़ाई से आती है… वो कमी उसमें रहेगी।”

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जैसे ही हिना अपने कमरे से बाहर निकली, वो एकदम अचानक कबीर से टकरा गई।कबीर—जो शायद बाहर से लौटा था, थका हुआ और किसी उलझन में डूबा हुआ—उसका चेहरा संजीदा और भरा-भरा लग रहा था। उसने हिना की तरफ एक तेज़, मगर बेमानी नज़र डाली — न नफरत, न अपनापन, बस एक थकी हुई बेरुख़ी…





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