“मोती… मोती!” पुकारती हुई आयरा गेट के बाहर आ गई थी।छोटा-सा पप्पी मोती तेज-तेज भाग रहा था और आयरा उसके पीछे भाग रही थी।भागते-भागते उसका दुपट्टा उतरकर उसके हाथ में आ गया। वह बुरी तरह हांफ रही थी, लेकिन उसका सारा ध्यान सिर्फ मोती पर था।अचानक वो गली की तरफ भागा—आयरा उसके पीछे थी।और उसी वक्त वो सामने से आती जीप के बिल्कुल सामने पहुँच गई।चीईईं…!जीप के ब्रेक जोर से लगे।“मरना है क्या?” गुस्से से आवाज आई।आयरा घबरा गई। उसकी डार्क ब्राउन आंखों में घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। उसने कांपते हुए हाथ से मोती की तरफ इशारा किया, जो अब गली में भागने लगा था।जीप से वारिस उतरा। उसने बिना कुछ कहे मोती को पकड़कर अपनी गोद में उठा लिया और वापस जीप में बैठ गया।आयरा घबराई हुई जल्दी से अंदर भाग गई।थोड़ी देर बाद जीप आयरा के पीछे अंदर आकर रुकी।वारिस ने मोती को नीचे उतारा।मोती फिर से उछलता-कूदता हुआ फिर आयरा के पीछे-पीछे आंगन की तरफ भागने लगा…। मोती ऐसे देखकर ना चाहते हुए भी वारिस के चेहरे पर स्माइल आ गई थी।आयरा बरामदे से होती हुई अपने कमरे की तरफ जा रही थी कि तभी मोती उसके पैरों में आकर लिपट गया।उसे देखते ही आयरा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।“अरे… तू फिर आ गया?”उसने प्यार से उसे उठाया और अपने साथ कमरे के अंदर ले गई।उधर वारिस सीढ़ियां चढ़ता हुआ सीधे ऊपर अपने कमरे में चला गया।किचन के पास बने खुले हिस्से में नूरां खड़ी थी।उसके चेहरे पर सोच साफ झलक रही थी।“क्या हुआ? क्या सोच रही हो?” उसकी अम्मी ने पूछा।नूर ने हल्की सी सांस ली—“अम्मी, मैं इस वारिस के साथ निकाह नहीं कर सकती।”“तुम जानती हैं ना, वो कितना गुस्से वाला है… किसी की नहीं सुनता।अपनी मर्जी का मालिक है।मुझे तो वो अब्बा जान से भी दो कदम आगे लगता है…अब्बा जान तो फिर भी कभी-कभी बात मान लेते हैं,लेकिन उसके सामने घर का कोई भी कुछ नहीं बोलता…”नूर की आवाज में साफ डर था।“तो फिर मैं क्या करूं? बात तो चल रही है ना तुम्हारी और उसकी…” अम्मी ने कहा।नूर के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई—“मैं बताती हूं, क्या करना है…”उसने थोड़ा पास आकर धीरे से कहा—“आप अब्बा जान से कहिए कि मेरा निकाह पहले कैसे हो सकता है?पहले आयरा का होना चाहिए…”अम्मी ने हैरानी से उसे देखा—“आयरा?”“जी, अम्मी… वो हमारी जिम्मेदारी है।बेचारी… उसके अब्बा भी नहीं हैं।सिर्फ मां-बेटी हैं दोनों।पहले हमें उसका घर बसाना चाहिए…”नूर की आवाज में हमदर्दी थी…लेकिन उसकी आंखों में एक अलग ही चालाकी चमक रही थी।“और आप तो जानती हैं, अब्बा जान को अपनी बहन की बेटी से कितना लगाव है…वो फौरन मान जाएंगे…”अम्मी कुछ पल सोचती रहीं, फिर धीरे से बोलीं—“बात तो तुम्हारी ठीक है…”“ठीक है, मैं तुम्हारे अब्बा से बात करती हूं।”इतना कहकर वो वहां से चली गईं।नूर वहीं खड़ी हल्के से मुस्कुराई…अपने ही प्लान पर।उसे पूरा यकीन था—ये चाल जरूर कामयाब होगी।क्योंकि वो अच्छी तरह जानती थी…वारिस और आयरा का निकाह होते ही,वो खुद इस रिश्ते से हमेशा के लिए आज़ाद हो जाएगी।और सच तो ये था—वो कभी भी वारिस जैसे जिद्दी और गुस्सैल इंसान के साथ अपनी जिंदगी नहीं बिताना चाहती थी…वारिस चौधरी…करीब 25 साल का नौजवान, जिसकी मौजूदगी ही अलग असर छोड़ती थी।उसकी लंबाई पूरे 6 फीट के करीब थी—लंबा, चौड़ा कद… बिल्कुल एक असली पंजाबी गबरू।रंग बहुत ज्यादा गोरा नहीं, बल्कि हल्का सा गेहुँआ—जो धूप में और भी सख्त और आकर्षक लगता था।उसका चेहरा तेज़ नैन-नक्श वाला,जॉ लाइन इतनी शार्प कि नजर वहीं ठहर जाए।आंखें… गहरी काली—इतनी गहरी कि जैसे उनमें झांकने वाला खुद खो जाए।उन आंखों में एक अजीब सा ठहराव था…और साथ ही छुपा हुआ गुस्सा भी।घनी, सजी हुई दाढ़ी उसके चेहरे को और भी रौबदार बनाती थी।मूंछें हल्की-सी ऊपर उठी हुई—जो उसके एटीट्यूड को और बढ़ा देती थीं।और साथ में पठानी सूट…जो उसकी पर्सनालिटी को और भी दबदबे वाला बना रहा था।चलने का अंदाज़ धीमा, लेकिन भारी…जैसे हर कदम सोच-समझकर रखता हो।वारिस चौधरी सिर्फ दिखने में ही नहीं,बल्कि अपने स्वभाव में भी एकदम अलग था।गुस्सा उसके चेहरे पर साफ झलकता थाकम बोलने वाला, लेकिन जो बोलता—सीधा और कड़ाजिम्मेदार इतना कि उम्र से ज्यादा समझदार लगता थावह इस घर का सबसे बड़ा बेटा नहीं था…लेकिन जिम्मेदारियां सबसे ज्यादा उसी के कंधों पर थीं।घर, खानदान, जमीन-जायदाद—हर चीज़ की फिक्र उसे ही रहती थी।लोग उससे थोड़ा डरते भी थे…और उतनी ही इज्जत भी करते थे।“वारिस चौधरी वो नाम था, जिसे लोग सामने आकर कम… और पीछे मुड़कर ज्यादा याद करते थे।”आयरा मलिक…नाम जितना नर्म, उसका चेहरा उससे भी ज्यादा नाज़ुक था।उसका रंग साफ़, दूधिया गोरा नहीं बल्कि हल्का सा गुलाबी आभा लिए उजला रंग था — जैसे सुबह की पहली रोशनी चेहरे पर ठहर गई हो।चेहरा बिल्कुल छोटा और नाजुक, दिल के आकार जैसा…और जब वो मुस्कुराती—तो उसके दोनों गालों में गहरे-गहरे डिम्पल (गड्ढे) पड़ते, जो किसी को भी पल भर में दीवाना बना दें।उसकी आंखें…गहरी भूरी (डार्क ब्राउन), बड़ी-बड़ी और बेहद एक्सप्रेसिव—जैसे बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह जाती हों।उन आंखों में मासूमियत भी थी… और कहीं न कहीं छुपी हुई शरारत भी।उसकी पलकों की लंबाई इतनी थी कि जब वो झपकती, तो जैसे हल्की सी हवा चल जाती हो।बाल लंबे, घने और काले—कमर तक गिरते हुए, हल्के-हल्के वेवी (लहरदार)।और जब चोटी बनाती तो कुछ लटें हमेशा चेहरे पर आ ही जातीं…उसकी नाक छोटी और नुकीली,होंठ हल्के गुलाबी—बिना किसी साज-सज्जा के भी बेहद खूबसूरत।कद ज्यादा लंबा नहीं, लेकिन बिल्कुल परफेक्ट—न ज्यादा पतली, न भारी… बस एक नाजुक सी 90s की देसी हीरोइन जैसी।चलने का अंदाज़ थोड़ा जल्दी-जल्दी वाला,जैसे हमेशा किसी जल्दी में हो…और बात करते वक्त हाथों का हल्का-हल्का हिलना उसकी आदत थी।जब हंसती—तो सिर्फ होंठ नहीं, उसकी आंखें भी हंसती थीं…और वही उसकी सबसे खतरनाक खूबसूरती थी।दिल से मासूम और सॉफ्टजानवरों से बहुत प्यार“आयरा मलिक वो लड़की थी, जिसे देखकर सुकून भी मिलता था… और बेचैनी भी।”आपकी बैकस्टोरी बहुत इमोशनल है 💔 मैंने इसे साफ़, गहराई और नॉवेल स्टाइल में एडिट किया है ताकि पढ़ने वाले के दिल पर असर पड़ेआयरा मलिक की ज़िंदगी जितनी बाहर से सादगी भरी दिखती थी,अंदर से उतनी ही अधूरी थी।उसके अब्बा…ज़िंदा हैं या नहीं—इस बात का जवाब आज तक किसी के पास नहीं था।आयरा की अम्मी का निकाह हुआ तो था,लेकिन वो सिर्फ एक ही बार अपने ससुराल गई थीं।उसका शौहर शहर से नहीं, बल्कि विदेश से आया था।कुछ दिन उनके साथ रहा…वादे किए—“मैं वापस आऊंगा… तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा…”लेकिन वो गया…और फिर कभी लौटकर नहीं आया।साल बीत गए…इंतज़ार खत्म नहीं हुआ।आखिरकार, टूटकर आयरा की अम्मी अपने मायके लौट आईं।तब तक…आयरा उनकी कोख में आ चुकी थी।आयरा ने जन्म लिया…और पली-बढ़ी अपने ननिहाल में।उसकी अम्मी ही उसकी पूरी दुनिया थीं—मां, बाप, दोस्त… सब कुछ।किसी ने उसे सिर पर बैठाया…ना किसी ने उसे गिरने से पहले थामा।वो खुद ही संभलना सीख गई थी।नूरां के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था…वो वारिस से निकाह नहीं करना चाहती थी।असल में… उसे पसंद था वसीम।नूर हल्का-सा मुस्कुराई—“जैसे ही वारिस का निकाह आयरा से होगा…अगली बात मेरी और वसीम की ही उठेगी…”वसीम अपनी बुलेट मोटरसाइकिल तेज़ रफ्तार से चला रहा था।अचानक—सड़क किनारे चल रही एक लड़की पर कीचड़ उछलकर जा गिरा।“देखते नहीं हो क्या! अंधे हो क्या?”लड़की गुस्से में चिल्लाई।उसने अपने बाल पीछे किए—उसकी काली-काली आंखें गुस्से से भरी हुई थीं।नीचे पड़ा पत्थर उठाकर उसने जाती हुई बाइक पर फेंका—लेकिन निशाना चूक गया।वसीम ने तुरंत ब्रेक लगाया और बाइक रोककर पीछे मुड़ा।“ओए, अंखां नहीं ने तैनूं? सड़क ते तुरदी एं, ध्यान नहीं रखदी?”उसने थोड़े गुस्से और एटीट्यूड में कहा।लड़की भड़क गई—“पागल हो क्या तुम? मार देते मुझे!”वसीम हंसा—“ओए, मैं जान-बूझ के नहीं कीता सी… अपने आप हो गया।”लड़की ने गुस्से से अपने कपड़ों की तरफ देखा—“मुझे कॉलेज जाना है! देखो मेरे सूट का क्या हाल कर दिया!”वसीम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और मुस्कुराया—“ओए चुड़ैलां वरगी लगदी एं… पहले वी, हुन होर वी बन गई एं!” 😏“तुम…!” लड़की ने गुस्से में एक और पत्थर उठा लिया।वसीम थोड़ा झुककर, शरारती अंदाज़ में बोला—“सच दੱਸां… आज तां होर वी सोहणी लग रही एं।” 💫लड़की और गुस्से में आ गई—लेकिन इससे पहले कि वो पत्थर फेंकती…वसीम हंसते हुए बाइक स्टार्ट कर चुका था।वसीम ने बाइक गेट पर रोकी।दोस्त ने हंसते हुए कहा—“फिर तंग किया उसे? बेचारी को पूरा गंदा कर दिया।”वसीम ने कंधे उचकाए—“ओए, कुड़ियां तां अपने आप ही मेरे पਿੱਛे फिरदियां ने…” 😎दोस्त हंस पड़ा—“तुम दोनों के बीच 36 का आंकड़ा है, वो नहीं छोड़ेगी तुम्हें।”वसीम मुस्कुराया—“ओए, मैं वी किथे हटण वाला आं…”उधर—वो लड़की… सानियागुस्से से खुद को साफ करती हुई,अपनी काली आंखों में आग लिएकॉलेज की तरफ बढ़ रही थी…








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