वारिस के पीछे-पीछे वसीम कमरे तक पहुंचा, मगर वह नहाने जा चुका था। कमरे में टेप रिकॉर्डर धीमी आवाज़ में Tere Tille Ton बजा रहा था, जिसे Kuldeep Manak ने गाया था। मीठी धुन पूरे कमरे में फैली हुई थी। वसीम जाकर बेड पर लेट गया, उसके पांव नीचे लटक रहे थे, और वह आंखें मूंदकर गाने में खो गया। यह वही कली थी जिसने कुलदीप माणक को पंजाबी लोक संगीत में अमर बना दिया—आज भी पंजाब में उतने ही शौक से सुनी जाती है।”हो… जोगी दे टिल्ले तों चड़के लंघी हीर नी,अंखियां दे विच हंजू, साडी खोटी तकदीर नी।””लश्कां मारदा हुस्न दा नूर नी,ज्यों चन बादलां चों निकले ज़रूर नी।मत्थे चंदा ते अंखियां शराव दीयां,गाल पुड़पुड़ियां वांग गुलाब दीयां।””सुर्खी शुतरी ते दंद चमेली दे,लिक्खे नैन कतारे हवेली दे।सुरमा नैणीं ते गल विच हार नी,हीर लंघी तां खिड़ गई बहार नी।””नाग वल खोंदे काले वाल नी,हिरनी दी टौर (चाल) ते बेमिसाल नी।कन्न विच बुंदियां ते नत्थ लश्के,देख हुस्न फकीर वि रह गए हक्के-बक्के।””कन्न पड़वा के मुंद्रां पा लईयां,हीर दी खातिर असी जोगी कहा लईयां।बालनाथ दे चरणीं, बह गया रांझा नी,रूह दी प्यास बुझावण, हो गया बांझा नी।””छपरां दी की ओट सजना, जों तू ओझल हो जावे,सारा जग सुन्ना लगे, जे तू दूर हो जावे।वारिस शाह दे वांगूं, लिखता किस्सा हीर दा,अज्ज वि रोवे रांझा, बनके जोगी पीर दा।”वसीम की नजरें धीरे-धीरे कमरे का जायजा लेने लगीं। दीवारों पर कोई तस्वीर नहीं थी, एक साइड ड्रेसिंग टेबल सजा था, और कोने में रखा कूलर ठंडी हवा बिखेर रहा था। खिड़की आधी खुली थी, जिससे बाहर की हवा भी अंदर आकर माहौल को और सुकूनभरा बना रही थी। बेड खिड़की के पास रखा था, जहां से पूरे आंगन पर नजर रखी जा सकती थी। पर्दा एक तरफ सिमटा हुआ था, जैसे कमरे को खुलापन देने के लिए।तभी वारिस नहा कर बाहर आया। उसने बेड पर लेटे वसीम को देखा और हल्की मुस्कान के साथ बोला,“तुम यहां क्या कर रहे हो? थके हुए आए हो… कुछ खा-पी“भाई, आप नाराज़ हो गए थे ना… मैं इसलिए आया था। मैं कहीं ऐसी-वैसी जगह नहीं जाता,” वसीम अपने भाई को सफाई देने लगा। वारिस, जिसने सिर्फ टॉवेल बांधा हुआ था, उसके पास आया तो वसीम भी तुरंत खड़ा हो गया। वारिस ने उसके सिर पर हल्का सा हाथ मारा, “पता है मुझे… लेकिन जिस दिन कहीं ऐसी जगह गया ना, देखना क्या हाल करूँगा तुम्हारा।”“तो भाई, आप मुझे ऐसे डराते क्यों हो?” वसीम ने मासूमियत से कहा।“बस फ़िक्र रहती है,” वारिस हल्का सा मुस्कुराया, “अब जाओ, कुछ खा-पी लो।”“जी भाई… लेकिन आप ये गाना सुन-सुनकर बोर नहीं होते? कितनी बार सुनते हो ये कुलदीप माणक की कली!” वसीम ने छेड़ा।“मुझे अच्छी लगती है,” वारिस ने सीधा जवाब दिया।वसीम शरारत से मुस्कुराया, “तो क्या इस वारिस की भी कोई हीर है… मतलब मेरी भाभी?”“जूते पड़ेंगे तुम्हें!” वारिस ने गुस्से से कहा।“अरे क्यों? आप इतने गबरू जवान हो… लड़कियों के तो दिल धड़क जाते होंगे आपको देखकर। कोई ना कोई तो पसंद आई होगी!” वसीम फिर बोल पड़ा।“अगर ऐसी फालतू बातें करनी हैं ना, तो सच में दो मारूँगा,” वारिस ने उसे घूरते हुए कहा, और वसीम तुरंत चुप होकर हल्का सा हँस दिया।“मैं तो बस पूछ रहा था… अगर मेरी कोई भाभी है तो बता दो, मैं घर पर बात कर लूंगा,” वसीम ने मुस्कुराकर कहा।“तुम्हारे लिए भाभी ढूंढना अम्मी का काम है, मेरा नहीं,” वारिस ने सादगी से जवाब दिया।“मतलब जिससे अम्मी कहेंगी, आप उसे ही पसंद कर लेंगे?” वसीम थोड़ा हैरान हुआ। घर के हर फैसले में वारिस की राय ली जाती थी, लेकिन अपनी शादी के मामले में उसका यूं अम्मी पर छोड़ देना उसे अजीब लगा।“मगर मैं तो अपनी मर्ज़ी से शादी करूंगा,” वसीम ने थोड़ा आत्मविश्वास से कहा।“अभी तुम्हारा नंबर पीछे है… पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो,” वारिस ने हल्की सख्ती से समझाया।“ठीक है… वैसे इस घर में दो ही लोग हैं जिन्हें म्यूजिक इतना पसंद है—आपको पंजाबी गाने, और आयारा को हिंदी गाने। अभी गया था, वो Saajan के गाने सुन रही थी,” वसीम ने बताया।“तो तुम्हें किसी की पसंद से क्या प्रॉब्लम है?” वारिस ने भौंहें चढ़ाकर कहा।“नहीं, बस ऐसे ही…” वसीम बात खत्म करके वहां से चला गया।वारिस वहीं बेड पर बैठ गया। उसने खिड़की से बाहर झांका—आंगन में उसकी बहन सना और आयारा दोनों आ चुकी थीं, और मोती उनके साथ खेल रहा था। ऊपर से उन्हें देखते हुए उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई, और फिर वो कुछ देर के लिए वहीं बैठा आराम करने लगा।शाम का वक्त था, और गांवों में हमेशा की तरह खाना जल्दी तैयार हो जाता था। एक तो बिजली की दिक्कत, ऊपर से गर्मियों की लंबी कटौती—इसलिए लोग देर करने के बजाय समय पर ही खाना खा लेते थे। खेतों से लौटकर सब अपने-अपने घरों में जुट जाते, और चौधरी के घर भी रसोई पूरी रफ्तार पर थी। अंदर लॉबी से जुड़ी छोटी किचन थी, जहां घर की औरतें खास काम करती थीं, जबकि बाहर अलग रसोई बनी थी—एक में गैस चूल्हा और दूसरी देसी चूल्हा, जहां असली स्वाद वाला खाना पकता था। चौके में भी एक चूल्हा जल रहा था, और वहीं मुलाजमाएं रोटियां सेंकने में लगी थीं, क्योंकि परिवार बड़ा था।आंगन में एक कूलर चल रहा था, जिसके पास चारपाइयां बिछी हुई थीं जहां घर के मर्द बैठकर खाना खाते थे, जबकि दूसरी तरफ एक बड़ा पंखा घूम रहा था, जिसके नीचे घर की औरतें बैठी थीं। धीरे-धीरे पूरा परिवार आंगन में इकट्ठा हो गया। डाइनिंग टेबल होते हुए भी उसका इस्तेमाल कम ही होता था—यहां तो सब खुले आंगन में साथ बैठकर खाने का मजा लेते थे। कोई चारपाई पर बैठा था, कोई कुर्सी पर स्टूल लगाकर प्लेट रखे हुए था, तो कोई पीढ़ी पर बैठ गया था। लड़कियां अक्सर वहीं रसोई के पास बैठकर खा लेती थीं।वारिस ने अपना खाना खत्म किया, फिर लॉबी में जाकर मोटरसाइकिल की चाबी उठाई और आवाज़ लगाकर अपनी अम्मी से कहा, जो चौके में काम कर रही थीं, “अभी मैं खेतों का एक चक्कर लगाकर आता हूं… लाइट भी जाने वाली है, देख लूं पानी कितना लगा है। रात को मोटर भी चलानी है और पानी की वारी भी है, नौकरों को बता कर आता हूं।” उसे पता था कि अम्मी फिक्र करेंगी, इसलिए बता कर ही निकला। बाहर आकर उसने शेड के पास मोटरसाइकिल स्टार्ट की। कुर्ते के नीचे कमर से बंधी रिवॉल्वर की नोक हल्की सी झलक रही थी, जो उसके रौब को और बढ़ा रही थी। उसी वक्त नूर की नजर उस पर पड़ी, और वह अनजाने में कुछ पल तक उसे देखती रह गई।पंजाबी लोक संगीत में Tere Tille Ton जैसी कलियों का बहुत खास स्थान रहा है, और Kuldeep Manak ने इन्हें अपनी आवाज़ से एक अलग पहचान दी। यह गाने सिर्फ मनोरंजन नहीं थे, बल्कि पंजाब की मिट्टी, इश्क़, दर्द और रिवायतों की झलक दिखाते थे। 70s–90s के दौर में ऐसे गीत गांवों की रोज़मर्रा जिंदगी का हिस्सा थे—शाम को टेप रिकॉर्डर पर बजते, महफिलों में गाए जाते और लोगों के जज़्बातों से जुड़ जाते थे। यही वजह है कि आज भी ये कलियां पंजाब के कल्चर में जिंदा हैं और सुनने वालों के दिलों में वही पुरानी कसक और अपनापन जगा देती हैं।


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