वसीम, जो वारिस के पीछे-पीछे अंदर आया था, सीढ़ियों की तरफ बढ़ा…मगर ऊपर जाने से पहले उसकी नज़र बेगम के कमरे की तरफ पड़ी।एक पल को वो ठिठका… फिर जैसे कुछ सोचकर ऊपर जाने की बजाय मुड़ गयाऔर सीधे अपनी फूफी जैनब के कमरे की तरफ चला गया —दरवाज़ा आधा खुला था।अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र आयारा पर पड़ी,जो रेडियो ठीक करने में लगी हुई थी।ट्रांजिस्टर से हल्की-हल्की खड़खड़ाहट आ रही थी…और फिर आवाज साफ हुई —“यह आकाशवाणी जालंधर है…अब प्रस्तुत है फिल्म Saajan का एक मधुर गीत,अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में…”और फिर धीमे-धीमे गूंजा —🎵 Bahut Pyar Karte Hain“बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम,कसम चाहे ले लो खुदा की कसम…”“भाई जान… मेरी बुक लेकर आए हैं क्या?”उसे देखते ही आयारा ने जल्दी से पूछा।वो दुपट्टा गले में ठीक करती हुई उसकी तरफ बढ़ी।“लेकर आया हूँ…” वसीम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।उसने हाथ में पकड़ी किताबों में से एक निकालकर आयारा की तरफ बढ़ा दी।“पिंजर…”आयारा ने जैसे ही नाम पढ़ा, उसकी आँखें चमक उठीं —“हाँ! मुझे Amrita Pritam की यही बुक चाहिए थी…”उसके चेहरे की खुशी साफ झलक रही थी।उसे रोमांटिक नॉवेल पढ़ने का बेहद शौक था…वसीम, जो सबके साथ बेहद कंफर्टेबल रहता था,आयारा के साथ उसका रिश्ता अलग था।वो उसे अपनी छोटी बहन की तरह मानता था —और आयारा भी उसे उसी भरोसे से देखती थी।अगर उसे शहर से कुछ मंगवाना होता,या कोई खास किताब चाहिए होती…तो बिना झिझक वो वसीम से कह देती —और वसीम भी हर बार उसकी बात पूरी करता।कभी कॉलेज की लाइब्रेरी से किताबें लाकर देता,तो कभी खुद खरीद कर।“एक हफ्ते में पूरी कर देना,”वसीम ने कहा,“फिर लाइब्रेरी में जमा करवा दूँगा… और तुम्हारे लिए दूसरी ले आऊँगा।”आयारा ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया,जैसे वो पहले ही उस किताब की दुनिया में खोने लगी हो।“चलो… मैं चलता हूँ। भाई जान मुझसे नाराज़ हैं… उन्हें मनाता हूँ,”वसीम ने कहा।“वो खड़ूस… किसी के साथ खुश होता भी है क्या?”आयारा ने होंठ सिकोड़ते हुए वारिस के बारे में कहा।“आयारा, ऐसे नहीं कहते…”पास ही बैठी जैनब ने उसे तुरंत टोका।“वैसे इसमें गलत भी कोई बात नहीं है…”वसीम ने मुस्कुराते हुए कहा।“वो मुझे डाँट कर गए हैं… मैं उन्हें मनाने जा रहा हूँ, उनके कमरे में…”इतना कहकर वसीम वहाँ से निकल गया।पीछे आयारा फिर से रेडियो की ट्यून सेट करने लगी —क्योंकि इस वक्त अच्छे गाने आते थे…रोमांटिक गाने, जो उसे बेहद पसंद थे।कुछ ही पल में धुन साफ होने लगी…और वही मीठा-सा गाना फिर से कमरे में गूंज उठा।वसीम तो ऊपर चला गया था…मगर उसी वक्त हवेली के बाहर से एक स्कूटर की जानी-पहचानी आवाज सुनाई दी।आँगन के गेट से अंदर आता हुआ वो Bajaj Chetak था —जिस पर तैमूर बैठा हुआ था।स्कूटर के आगे एक बैग टंगा हुआ था,जिसे उसने अंदर आते ही उतार लिया।दिखने में तैमूर भी कम हैंडसम नहीं था…मगर इस घर में एक वही था जिसे पढ़ाई का सबसे ज्यादा शौक था।बी.एससी सेकंड ईयर में था — नॉन-मेडिकल का स्टूडेंट।उसे मैथ्स से खास लगाव था…उस में चौधरियों वाला गुस्सा नहीं था और ना ही वह एटीट्यूड था ,वह सबसे अलगथा।खुद में रहने वाला,और थोड़ा अलग-सा।वो नासिर चौधरी का बड़ा बेटा था।अंदर आते ही उसकी नज़र सामने बैठे अपने ताया जान पर पड़ी —उसने अदब से सलाम किया…और बिना ज्यादा कुछ बोले,सीधे अंदर की तरफ बढ़ गया।जैसे ही तैमूर लॉबी के अंदर आया,उसी वक्त अपने कमरे से सना बाहर निकली।उसकी नज़र जैसे ही तैमूर पर पड़ी,उसने हल्का सा मुँह बनाया…और बिना उसे आवाज दिए, सीधे मुड़कर आयारा के कमरे की तरफ चल दी।असल में उसकी और तैमूर की बात बचपन से ही पक्की थी।कोई बाकायदा मंगनी तो नहीं हुई थी,मगर घर में सब यही मानते थे कि सना उसी की मंग है।इस घर में कोई भी रिश्ता इतना साफ और तय नहीं था…सिवा इन दोनों के।और इसकी वजह भी बहुत पुरानी थी।जब सना छोटी थी,तो बहुत ही प्यारी लगती थी…गोल-मटोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें।तब तैमूर की अम्मी शाहीन बेगम के सिर्फ तैमूर ही था,अभी और औलाद नहीं हुई थी।उन्हें हमेशा एक बेटी की ख्वाहिश रही…और सना को देखते ही वो उसे गोद में उठा लेतीं,उसके साथ खेलती रहतीं।तैमूर उससे कुछ साल बड़ा था,तो वो हँसते हुए कहा करतीं —“इसे तो मैं अपनी बेटी बनाऊँगी…”एक दिन यूँ ही बैठी बातों-बातों मेंसना की अम्मी  ने मुस्कुराकर कह दिया —“तो फिर अपनी ही बेटी बना लेना…जब बड़े होंगे ना,तब तैमूर के साथ ही इसका निकाह कर देंगे…”बस, उसी दिन से ये बात जैसे घर में ठहर गई थी।किसी ने लिखकर तय नहीं किया था,मगर सबके दिलों में ये रिश्ता पक्का हो चुका था। ❤️सना को तैमूर बिल्कुल पसंद नहीं था।उसकी नफरत का कारण  था पढ़ाई।नूर और आयरा भी तो सिर्फ 10वीं तक पढ़ी थीं…सना को लगा था, “जब ये लोग 10th के बाद पढ़ाई छोड़ गईं, तो मेरी भी पढ़ाई यहीं खत्म हो जाएगी।”वो आज़ाद होना चाहती थी… किताबों से, स्कूल से, और उस पढ़ाई  से जिसे वह बोझ समझती थी।लेकिन तैमूर की वजह से उसकी ज़िंदगी बदल गई।तैमूर ने अपनी अम्मी के ज़रिए कहलाया कि सना आगे पढ़ेगी, और अब गांव का स्कूल भी प्लस टू तक बढ़ गया था।सना को लगा कि उसने जो भी सोचा, उसकी आज़ादी सब कुछ… तैमूर ने छीन लिया।इसलिए वह उससे नाराज़ रहती थी।वो गुस्से में सोचती थी, “अगर तैमूर न होता तो मैं अपनी पढ़ाई खुद छोड़ देती…”वैसे भी, दोनों के बीच कभी सीधी बात नहीं होती थी। उनके रिश्ते की वजह से हमेशा वह दोनों एक दूसरे से एक दूरी रखते थे।“तुम बैठो… मैं चलती हूँ।”सना कमरे के अंदर आते ही ।जैनब बेगम, जिन्हें अचानक कोई काम याद आ गया था,उठीं और बाहर चली गईं।अब कमरे में बस आयारा और सना ही रह गई थीं…और खिड़की के पास रखा रेडियो धीमे-धीमे अब भी वही रोमांटिक धुन बजा रहा था। 🎶“बस… मेरी किस्मत में ही ये क्यों लिखा था…”सना ने मुँह बनाते हुए कहा।आयारा उसे देख कर मुस्कुरा दी —“ तू  उसी के पीछे पड़ी रहती है।क्या कह दिया है उसने तुझे?” आयारा ने कहा।“तू मेरी सहेली है या उसकी?”सना ने आँखें तरेर कर कहा।“सहेली तो मैं तुम्हारी ही हूँ…”आयारा ने हँसते हुए जवाब दिया।और फिर दोनों खिलखिला कर हँस पड़ीं।उधर तैमूर…सना के सामने तो उसने जैसे उसे बिल्कुल इग्नोर कर दिया था।ऐसा लगा जैसे उसने उसकी तरफ देखा तक नहीं।मगर जब सना ने उसे देखते ही मुँह बनाया था…तो वो नज़ारा देखकर तैमूर के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई थी।बस… सना के सामने उसने वो मुस्कान रोक ली।लेकिन जैसे ही वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा,उसकी दबाई हुई हँसी आखिर बाहर आ ही गई।वो मुस्कुराता हुआ ऊपर जा रहा था।सच तो ये था कि —सना उसे बचपन से ही पसंद थी…और आज भी उतनी ही पसंद थी।बस फर्क इतना था कि अब वो बड़ा हो चुका था…और ये समझता था कि हर बात जताई नहीं जाती ऐसे कर सकते हैं कि अभी जताने का टाइम नहीं आया था।इसलिए उसने कभी जाहिर नहीं होने दियामगर…उसकी नज़रें अक्सर उसे ढूंढ ही लेती थीं।और जब भी देखता…तो उन्हीं आँखों से देखता,जिनमें हमेशा एक खामोश-सा प्यार छुपा रहता था।❤️तेरी हँसी में जैसे सारा जहाँ बसता है,तेरी बातों से दिल हर रोज़ महकता है…तुझे देख लूँ तो सुकून सा मिल जाता है,_वरना ये दिल तेरे बिना यूँ ही धड़कता है…


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