नूर, आयारा के पास आकर बैठ गई, जो वहीं रोटी खा रही थी।“तुम्हें क्या लगता है, आयारा…” नूर ने धीरे से कहा।“किसके बारे में?” आयारा ने हैरानी से पूछा।“ये जो रोज रात को खेतों का चक्कर लगाने जाता है…” नूर ने इशारा किया।“कौन?” आयारा को अभी ध्यान ही नहीं था।“वारिस… तुम्हें क्या लगता है, ये सच में सिर्फ खेत ही जाता होगा?” नूर ने आंखें सिकोड़कर कहा।“अरे, अपनी अम्मी को तो कहकर जाते हैं कि खेत देखने जा रहे हैं,” आयारा ने सीधी बात कही।“नहीं आयारा…” नूर ने थोड़ा झुककर फुसफुसाया, “मुझे लगता है ये किसी से मिलने जाता है… जरूर इसका कोई चक्कर है।”आयारा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई, “अच्छा… मतलब किसी से प्यार करते हैं?”फिर उसने खुद ही सिर हिलाया, “मगर इस वक्त कौन मिलने आएगा? सबके अपने-अपने काम होते हैं…” इतना कहकर वह फिर से आराम से खाना खाने लगी, जबकि नूर अब भी सोच में डूबी हुई थी।“नहीं,” नूर ने धीमे लेकिन यकीन भरे लहजे में कहा, “मुझे नहीं लगता ये प्यार-व्यार का चक्कर है… इस खडूस के साथ कौन निभाएगा? ये किसी और ही काम से जाता है।”“अच्छा?” आयारा ने हल्की दिलचस्पी से पूछा, “तो फिर खेत नहीं जाता?”“नहीं,” नूर ने सिर हिलाया।“तो फिर किस काम से?” आयारा ने फिर सवाल किया।नूर ने हल्के से उसके सिर पर चपत लगाई, “समझा करो… औरतों के पास क्यों जाते हैं मर्द रात को?”आयारा ने बिल्कुल मासूमियत से उसकी तरफ देखा, “किसलिए जाते हैं?”नूर ने थोड़ा झुंझलाकर कहा, “गानों और किताबों की दुनिया से बाहर निकलो… असली बातें समझा करो। मर्द क्यों जाता है औरतों के पास? पैसे देकर ही जाता होगा किसी के पास…”अब आयारा को उसकी बात का इशारा समझ आया, मगर उसने तुरंत नूर को टोका, “ये कैसी बातें कर रही हो?” उसके चेहरे पर कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।“नहीं, मैं सच कह रही हूं… देख लेना, अपनी बीवी को तो जूती की नोक पर रखेगा,” नूर ने कहा, फिर धीरे से जोड़ दिया, “और क्या पता, अब्बा की तरह दो निकाह भी करे…”वो कुछ पल को रुकी, फिर जैसे खुद को रोकते हुए बोली, “मैं कहना तो नहीं चाहती… मगर फरहान भाई का भी…” और अचानक चुप हो गई।“क्या?” आयारा ने तुरंत पूछा, “पेट्रोल पंप पर क्या?”नूर ने इधर-उधर नजर दौड़ाई, फिर धीमी आवाज़ में बोली, “वहां जो चौकीदार रहता है ना… उसकी बेटी के साथ उनका चक्कर है। पैसे भी देते हैं, कपड़े भी दिलाते हैं…”आयारा ने उसे हैरानी से देखा—जैसे यकीन ही न हो। उसे इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह तो अब भी अपनी किताबों और गानों की दुनिया में रहने वाली सीधी-सादी लड़की थी, जिसे ऐसी बातों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था।“तो फरहान भाई का मैं क्या कहूं… मैं तो इसकी बात कर रही हूं। फरहान भाई पढ़े-लिखे हैं, संभलकर चलते हैं… लेकिन ये, देख लेना, पहली बीवी के होते हुए भी दूसरी ले आएगा,” नूर ने यकीन से कहा।“क्या बातें कर रही हो तुम?” सना उनके पास आ गई थी, उन्हें धीरे-धीरे बात करते देख उसने पूछा।“नहीं, कुछ नहीं…” नूर ने बात टाल दी।आयारा बेवजह ही उसकी बातों से परेशान हो गई थी।“क्या हुआ? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?” सना ने उसके पास बैठते हुए पूछा।“नहीं… कुछ नहीं,” आयारा ने हल्का सा मुस्कुराकर कहा और वहीं बैठकर खाना खाने लगी।नूर चुपचाप अंदर चली गई। सच तो यह था कि वह वारिस के बारे में यही सब सोचती थी, लेकिन आज उसने जानबूझकर ये बातें आयारा के मन में डाल दी थीं, क्योंकि उसे पता था कि आयारा का रिश्ता उसी के साथ जोड़ा जा रहा है। शायद दूसरों को उलझन में देख उसे सुकून मिलता था। पर कहीं न कहीं इसमें उसका भी कसूर पूरा नहीं था—बचपन से उसने अपने बाप की मोहब्बत वैसे कभी पाई ही नहीं थी। वह हमेशा अपने बेटों और दूसरी बीवी में उलझा रहा। नूर के दिल में यह बात बैठ चुकी थी कि जो प्यार दूसरी बीवी को मिलता है, वह पहली को कभी नहीं मिल सकता… और न ही उसके बच्चों को।राशिद चौधरी ने खाना खाते हुए अपने छोटे भाई सलीम चौधरी से कहा, “सबसे पहले आयरा इस घर की जिम्मेदारी है… इसलिए नूर से पहले हमें आयरा के निकाह के बारे में सोचना चाहिए। आया था और वारिस दोनों का निकाह कर देते हैं।”“ठीक है, मैं वारिस की अम्मी से बात करता हूं,” सलीम ने कहा।राशिद चौधरी ने तुरंत टोका, “उससे बात किसलिए? तुम मर्द हो, सीधे हां नहीं कर सकते?”सलीम चौधरी हल्का सा मुस्कुराया, “हां तो कर सकता हूं… मगर वह अपनी अम्मी की हां के बिना मानने वाला नहीं है। हमेशा यही कहता है—जिसे अम्मी पसंद करेंगी, उसी से निकाह करूंगा।”“ठीक है, पहले अपनी बीवी से बात कर लो, फिर हम सब मिलकर बैठेंगे,” राशिद चौधरी ने फैसला सुनाया, “क्योंकि वारिस की हां के बाद भी जैनब से बात करनी होगी।”और आयारा… उससे तो जैसे पूछने का सवाल ही नहीं था।उसका अपना बाप सालों पहले विदेश गया था और फिर कभी लौटा ही नहीं। उसकी अममी भी निकाह के बाद बस एक बार ससुराल आई थी, और एक हफ्ते के अंदर ही वह चला गया था—जो आज तक वापस नहीं आया। ऐसी हालत में आयारा की राय की किसी को फिक्र ही कहां थी।नादान है वो, उसे क्या खबर है किस्मत की चालों का,जिसे वो बदनाम समझ रही है, वही लिखा है उसके ख्वाबों में।जिस राह से वो डरती है, उसी राह पे जाना होगा,जिसे ठुकराने की सोच रही है, उसी को अपना बनाना होगा।किस्मत के खेल भी अजीब होते हैं इस जहां में,जिसे दिल से दूर रखो, वही आ बसता है अरमानों में।1970 के दशक के आखिर से लेकर 1990 के दशक के मध्य तक पंजाब में NRI शादियों का यह चलन तेज़ी से बढ़ा। उस दौर में विदेशों (खासतौर पर कनाडा और UK) से आए कई लड़के गांवों में शादी करके लौट जाते थे, लेकिन अपनी पत्नियों को साथ नहीं ले जाते थे। शुरू में वे वीज़ा या कागज़ात का बहाना बनाते, फिर धीरे-धीरे संपर्क तोड़ देते थे—कुछ मामलों में तो वे विदेश में पहले से शादीशुदा भी होते थे। यह सिलसिला 1990 के बाद कम होने लगा, जब लोगों में जागरूकता बढ़ी और सरकार ने सख्ती करनी शुरू की।


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