सुबह लड़कियों को कॉलेज नहीं जाना था। जब तक एग्ज़ाम शुरू नहीं होते, उन्हें घर पर ही रहकर पढ़ाई करनी थी। इसलिए उन्होंने सोचा था कि आज थोड़ा देर से उठेंगी। मगर हवेली के नियम इतने ढीले नहीं थे कि कोई भी मर्ज़ी से उठे और अपनी सहूलियत से नीचे आए।हवेली का एक सख़्त निज़ाम था — चाहे लड़कियाँ कॉलेज जाएं या न जाएं, उन्हें नहा-धोकर, पूरी तरह तैयार होकर ही डाइनिंग टेबल पर पहुँचना होता था। नाइट सूट में बाहर आना बिल्कुल भी स्वीकार नहीं था। भले ही वे दिनभर अपने कमरों में आराम करें, लेकिन नाश्ते के वक़्त सबका एकसाथ हाज़िर होना बेहद ज़रूरी था।घर के लड़के — चाहे कबीर हों, तैमूर हो — उन्हें यह छूट थी कि वे बिना नहाए, नाइट सूट में ही पूरे घर में घूम सकते थे। लेकिन लड़कियाँ नाश्ते से पहले तैयार होकर ही अपने कमरे से बाहर आती थीं। खाना खाकर ही वे रिलैक्सिंग कपड़ों में वापस बदलतीं, जब यकीन हो जाता कि उन्हें बाहर नहीं जाना है।घर की औरतें — तीनों भाभियाँ, सलीमा भाभी (कबीर की अम्मी), शगुफ़्ता भाभी (हिना की अम्मी), और रिहाना भाभी (तैमूर की अम्मी) — सुबह-सुबह डाइनिंग टेबल पर नाश्ता सजा रही थीं।मुस्लिम घराने का पारंपरिक नाश्ता तैयार किया जा रहा था: हलकी सी तले हुए पराठे, खमीरी रोटियाँ, पनीर की भुर्जी, उबले अंडे, बेसन का हलवा, और साथ में दारचिनी वाली चाय। साथ ही, मेज़ पर खजूर और बिस्किट भी रखे गए थे। चाय के साथ ज़ाफ़रानी दूध और शीरमाल भी रखे गए थे।इस सुबह की बात कुछ और ही थी। घर में एक खास मेहमान मौजूद थीं — फरीदा बानो, दादा जान और दादी जान की इकलौती बेटी, और तीनों भाइयों की बहन।फरीदा बानो मिर्जा अहमद, वकार मिर्जा और सईद मिर्जा की बहन थी।उम्र में वह मिर्जा अहमद से छोटी थीं, लेकिन वकार और सईद दोनों से बड़ी थीं।उनके साथ उनके पति भी आए थे — रईस हुसैन। वह एक सुलझे हुए, शांत स्वभाव के और धार्मिक रुझान रखने वाले व्यक्ति थे, जिन्हें पूरे खानदान में इज़्ज़त और मोहब्बत से देखा जाता था।डाइनिंग टेबल पर सभी इकट्ठा हो चुके थे — दादा जान, दादी जान, मिर्जा साहब, तीनों बहुएँ, कुछ लड़कियाँ और लड़के। फरीदा बानो को देखकर दादी जान की आँखों में चमक थी, और दादा जान का चेहरा भी बेहद सुकून से भरा हुआ था।  उनकी बेटी उनके सामने बैठी थी।दादी जान ने प्यार से उसका हाथ थामा और पूछा,”कैसी हो मेरी बच्ची?”फरीदा बानो ने मुस्कुरा कर जवाब दिया,”अम्मी, जैसे आपके पास आ जाती हूँ, सब कुछ अच्छा लगने लगता है।”थोड़ीदादी जान ने प्यार से उसका हाथ थामा और पूछा,”कैसी हो मेरी बच्ची?”फरीदा बानो ने मुस्कुरा कर जवाब दिया,”अम्मी, जैसे आपके पास आ जाती हूँ, सब कुछ अच्छा लगने लगता है।”थोड़ी देर सबने साथ में नाश्ता किया। घर की रौनक मानो दोगुनी हो गई थी। चाय के कप के साथ हल्की बातचीत चल रही थी। इतने में फरीदा बानो ने अपना कप नीचे रखा और बोलीं:”आज मैं आप सबसे कुछ माँगने आई हूँ…”उनकी बात सुनकर पूरा घर शांत हो गया। सबकी नज़रें उनकी तरफ़ उठीं — दादा जान ने भौंहें थोड़ी चढ़ाईं, और मिर्जा साहब ने हैरानी से पूछा,”क्या बात है, फरीदा?”फरीदा बानो कुछ पल चुप रहीं। उनकी आँखों में संजीदगी थी, आवाज़ में मोहब्बत और विनम्रता।—फरीदा बानो, मिर्जा साहब की इकलौती बेटी थी, इसी शहर में रहती थीं। उनका ससुराल एक पढ़ा-लिखा और संभ्रांत खानदान था। उनके शौहर राहीस हुसैन  एक बहुत ही समझदार और शिक्षित व्यक्ति थे, जिनका अपना बड़ा और सफल कारोबार था। वह व्यापार के साथ-साथ समाजिक दृष्टिकोण से भी काफी खुले विचारों वाले इंसान माने जाते थे।हुसैन साहब का घर का माहौल, मिर्जा साहब के घर की तुलना में थोड़ा ज़्यादा खुला और आधुनिक था। दोनों घरों की परवरिश और माहौल में अंतर तो था, मगर रिश्ता अब भी वैसा ही मजबूत था जैसा एक भाई-बहन के परिवारों में होता है।फरीदा और हुसैन के दो बच्चे थे —बेटा: अरहान हुसैन रिज़वीबेटी: मेहरूनिसा रिज़वीअरहान ने बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी और अब अपने पिता के साथ कारोबार में हाथ बँटा रहा था। मेहरूनिसा भी कॉलेज में पढ़ रही थ।आज फरीदा बानो मिर्जा हाउस आई थीं — एक खास मक़सद के साथ। वह चाहती थीं कि उनका बेटा अरहान, मिर्जा साहब की किसी पोती से निकाह करे, और उनकी बेटी मेहरूनिसा के लिए भी वह इसी खानदान से रिश्ता तय करना चाहती थीं।सच कहें तो यह बात दादी जान से पहले ही हो चुकी थी।इस घर में जो दादी जान कह देती थीं, वही आख़िरी फ़ैसला माना जाता था।फरीदा का स्वभाव थोड़ा तेज़ और मुखर था।अपने बच्चों के लिए वह सबसे अच्छा ही चाहती थीं — और यह “सबसे अच्छा” उन्हें अपने मायके में ही नज़र आया था।—पूरी फै़मिली डाइनिंग टेबल पर मौजूद थी।तीनों भाभियाँ — सलीमा, शगुफ़्ता और रिहाना — नाश्ता सर्व कर रही थीं।कबीर, अयान,   और   तैमूर के साथ बैठे थे।घर की सारी बेटियाँ — हिना, हवा , कहकशां और साबिहा— भी वहाँ मौजूद थीं।तीनों भाई — अहमद, सईद और वकार — और खुद मिर्जा साहब व दादी जान भी टेबल पर मौजूद थे। माहौल गरम चाय और हल्की-फुल्की बातों से भरा हुआ था।तभी फरीदा बानो ने धीमे मगर साफ़ लहजे में कहा,”आज मैं आप सबसे कुछ माँगने आई हूँ…”उनकी इस बात पर कुछ पल को सन्नाटा सा छा गया।अहमद मिर्जा ने हल्के से मुस्कराते हुए, मगर थोड़ा चौंक कर कहा:”क्या चाहिए तुम्हें, फरीदा? और माँगने की ज़रूरत क्या है? यह घर तुम्हारा ही है।”उसका मानना था कि अगर वह अपने बेटे की शादी इसी घर में करेगी, तो वह लड़की उसके नियंत्रण में रहेगी।बाहर से आई हुई लड़की के स्वभाव और परवरिश के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता — न जाने कै seसी हो, कौन से माहौल से आई हो।लेकिन इस घर की लड़की उसके सामने पली-बढ़ी है, उसे अच्छे से जानती है, लिहाज़ करना जानती है — और सबसे बड़ी बात, उसे वह संभाल सकती है।उसी तरह, वह अपनी बेटी की शादी भी अपने किसी भतीजे के साथ करना चाहती थी।उसे पूरा विश्वास था कि उसकी अम्मी और अब्बा उसकी बेटी का उसी प्यार और देखभाल से ख्याल रखेंगे।उसे यह भी लगता था कि इस घर का माहौल उसकी बेटी के लिए सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक रहेगा।-


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सुबह लड़कियों को कॉलेज नहीं जाना था। जब तक एग्ज़ाम शुरू नहीं होते, उन्हें घर पर ही रहकर पढ़ाई करनी थी। इसलिए उन्होंने सोचा था कि आज थोड़ा देर से उठेंगी। मगर हवेली के नियम इतने ढीले नहीं थे कि कोई भी मर्ज़ी से उठे और अपनी सहूलियत से नीचे आए।हवेली का एक सख़्त निज़ाम…

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