वो जानवी के सामने टेबल पर बर्तन रखी। जया को डर था कि जय कोई रस्म नहीं करेगा। इसीलिए वह किसी की भी रस्म के लिए जय को मजबूर नहीं करना चाहती थी। फिर भी उसने कहा, “जय, आ जाओ।”
मगर वो उसकी बात का जवाब ना देते हुए ऊपर की तरफ जाने लगा। रेखा और माला एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराईं।
“लगता है जेठ जी को सुनाई नहीं दिया,” माला ने कहा। “वह ऊपर की तरफ चले गए।”
“अब उनकी कौन सी पहली शादी है?” माला ने कहा। “उन्हें क्या फर्क पड़ता है इन रस्मों से? वैसे भी इस उम्र में यह सब बातें अच्छी कहाँ लगती हैं? इन बातों की भी एक उम्र होती है।”
“यह तुम क्या बोल रही हो?” जया ने थोड़े गुस्से से कहा।
“नहीं, मम्मी जी, सही बात है। दीदी, आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए,” माला ने रेखा से कहा। “उसे शादी में जेठ जी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था। मैं तो आई थी शादी में। मैंने तो अटेंड की थी वह शादी। उसी के बाद तो हमारी शादी हुई थी। वह तो फिर अंग्रेजन थीं; उसे इन सब चीजों में कोई इंटरेस्ट नहीं था। विदेश में शादी हुई थी और वह भी चर्च में। जेठ जी बहुत ज्यादा खुश थे; उनकी खुशी तो देखने वाली थी।”
माला और रेखा दोनों जानबूझकर जानवी को तंग कर रही थीं। क्योंकि बिज़नेस में जयराज की ही चलती थी। वह सारा बिज़नेस वही हैंडल करता था और उन्हें लगता था कि अब जानवी भी घर पर चलेगी, जो वह ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहती थी।
“इस पानी का क्या करना है?” युग ने पूछा।
“इसमें से रिंग निकालनी है। जो पहले ढूंढेगा, सभी बातें उसी की मानी जाएंगी।”
जानवी नज़रें झुकाए हुए पानी में जो फूल थे उनकी तरफ देख रही थी। उसे तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। वह उसे जय की ज़िंदगी में और फैमिली में उसकी हैसियत बता रही थी; पूरी फैमिली के सामने जय का रस्में इग्नोर करके जाना।
“मामा, हम गेम खेलें,” युग ने कहा।
जानवी ने युग की तरफ देखा और मुस्कुराई। “चलो खेलते हैं।”
वह दोनों उसमें रिंग ढूंढने लगे। जानवी भी ढूंढने का नाटक करती रही और युग को रिंग मिल गई।
“देखो मामा, मुझे मिली है! तो अब आपको मेरी हर बात माननी पड़ेगी!” युग बहुत खुश था।
“ठीक है,” जानवी ने उसकी निश्चल हँसी को देखकर कहा। उसे सचमुच उस पर बहुत प्यार आ रहा था। वो बिन माँ का बच्चा था और माँ के बिना ज़िंदगी कैसी होती है, वह जानती थी। उसके तो माँ-डैड दोनों ही नहीं थे।
युग उन लोगों के पास आकर मुस्कुराने लगा। तब तक घर के दूसरे मेम्बर भी वहाँ आकर बैठ गए थे। वह भी वहाँ बैठकर मुस्कुराने लगे। युग खुश होकर अपनी जीतने के बारे में बता रहा था।
“जय कहाँ है?” राजन इधर-उधर देखते हुए पूछने लगा।
“जेठ जी तो ऊपर चले गए,” माला ने जवाब दिया।
राजन जय को फ़ोन लगाने लगा।
तभी पीछे से आवाज़ आई, “आप मुझे फ़ोन किस लिए लगा रहे हैं, डैड?”
सभी पीछे से सीढ़ी की तरफ देखा। जय ने कपड़े चेंज कर लिए थे। उसने जींस और टी-शर्ट पहनी हुई थी।
“हम लोग तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं,” राजन ने कहा।
जय जाकर जानवी के पास सोफ़े पर बैठ गया। एक साइड उसके युग बैठा हुआ था।
“क्या करना है?” उसने सभी की तरफ देखते हुए पूछा।
“करना क्या है? रिंग ढूँढो! जिसे रिंग मिलेगी, पूरी लाइफ़ उसी की मर्ज़ी चलेगी!” राजन ने हँसकर कहा।
“देखो डैड, मैं जीता हूँ! अब मामा को तो हमेशा मेरी बात माननी पड़ेगी!” युग रिंग अपने हाथ में पकड़े बैठा था।
“ठीक है, अब मुझे भी तुम्हारी मामा को हराना है। फिर तुम्हारी मामा को मेरी भी हर बात माननी पड़ेगी,” जय ने प्यार से कहा।
“बिल्कुल भी नहीं! मेरी माम ही जीतेगी और हम आपको हरा देंगे! ठीक है मामा,” युग ने अपने हाथ की रिंग उस बर्तन में गिरा दी।
जय जिस तरीके से बात कर रहा था, जानवी सुनकर काफी हैरान हो रही थी। उसने चाहे एक बार भी नज़र उठाकर जय की तरफ़ नहीं देखा था, ना ही उसके मन में जय के लिए ऐसी कोई फीलिंग थी। पर सभी परिवारिक मेम्बरों के बीच अब उसे अपनी स्थिति अटपटी नहीं लग रही थी।
युग अपनी जगह से उठकर टेबल की दूसरी तरफ़ आकर खड़ा हो गया था। जय और जानवी सोफ़े पर बैठे थे। रेखा की बात पर जय और जानवी दोनों बर्तन में रिंग ढूँढने लगे। युग भी रिंग ढूँढने लगा। रिंग युग को मिल गई।
“मामा, आप जीत गए!” उसने जानवी को रिंग पकड़ा दी। “अब डैड को आपकी हर बात माननी पड़ेगी।”
“तुम तो पार्टी बदल गए!” जय ने हँसकर युग के गाल पर हाथ रखा।
युग जाकर वापस जानवी के पास बैठ गया। “ठीक है, अब तो हो गई रस्में,” जय वहाँ से खड़ा होने लगा।
“नहीं, अभी तो और भी हैं,” रेखा ने कहा।
“सॉरी, बहुत टाइम हो चुका है और बहुत थकावट हो रही है। युग, जाओ मॉम को ऊपर ले जाओ।”
तभी सविता वहाँ आती है। “चलिए मैडम, मैं ऊपर आपके कमरे में छोड़ देती हूँ।” जानवी ने जया की तरफ़ देखा।
जया ने उसे आँख से जाने का इशारा कर दिया। वह लोग सीढ़ी की तरफ़ जाने लगे।
“रुको, लिफ़्ट से जाओ!” जय ने ऊँची आवाज़ में कहा।
“चलिए मैडम, उधर से लिफ़्ट है। उधर से चलते हैं।” वह लिफ़्ट से ऊपर जाने लगे।
जानवी को सचमुच बहुत थकावट हो गई थी। वह रेस्ट करना चाहती थी।
लिफ़्ट से वह तीनों टॉप फ्लोर पर पहुँचते हैं। लिफ़्ट से जैसे ही जानवी ने उस फ्लोर पर प्रवेश किया, यह फ्लोर सचमुच बहुत शानदार था; ग्राउंड फ्लोर से बहुत डिफरेंट और मॉडर्न था। जानवी आस-पास देखते हुए जा रही थी। “इधर चलिए, आपका कमरा है,” सविता ने कहा।
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वो जानवी के सामने टेबल पर बर्तन रखी। जया को डर था कि जय कोई रस्म नहीं करेगा। इसीलिए वह किसी की भी रस्म के लिए जय को मजबूर नहीं करना चाहती थी। फिर भी उसने कहा, “जय, आ जाओ।” मगर वो उसकी बात का जवाब ना देते हुए ऊपर की तरफ जाने लगा। रेखा…







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