सुबह का वक्त था। 15 अगस्त। पूरा शहर तिरंगे में रंगा हुआ, गलियों में बच्चे झंडियां लहरा रहे थे, कहीं देशभक्ति गीत गूंज रहे थे, तो कहीं स्कूलों में कार्यक्रम की तैयारी थी।पर फौजी कप्तान अर्जुन सिंह राठौड़ के घर का माहौल थोड़ा अलग था।उनकी पत्नी मीरा बालकनी में खड़ी, हवा में झूलते तिरंगे को निहार रही थी। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही उड़ती हुई मुस्कान थी — जैसे हवा को भी अपने साथ नचा ले। लेकिन आज उसकी आंखों में हल्की सी नमी भी थी।अर्जुन तैयार होकर आ रहे थे — वर्दी में, सीना चौड़ा, आंखों में एक अलग चमक। लेकिन वो चमक सिर्फ देश के लिए थी… घर के लिए नहीं। घर का हर कोना जानता था कि जब अर्जुन 15 अगस्त को ड्यूटी पर जाते हैं, तो मीरा का दिल थोड़ा टूटता है… फिर भी वह टूटने नहीं देती।—सुबह की बात“तो आज भी पूरा दिन मुझे भूल जाओगे?” मीरा ने चाय कप में डालते हुए कहा।अर्जुन हंस पड़े —“मीरा… ये दिन देश का है। तुम्हारा हक़ बाकी 364 दिन है, लेकिन आज का दिन… मैं सिर्फ तिरंगे का हूं।”मीरा ने कप उनकी तरफ बढ़ाया —“और मैं? मैं तो तिरंगे की परछाई हूं, अर्जुन। जब वो ऊंचा लहराता है… मैं यहां बालकनी से बस देखती रहती हूं, तुम्हारे साथ का सपना।”अर्जुन ने उसके हाथ पर हल्का सा हाथ रखा —“तुम ही तो हो जो मुझे ताकत देती हो, मीरा। तुम नहीं होती… तो शायद मैं ये वर्दी भी नहीं पहन पाता।”–गेट पर जीप खड़ी थी। बाहर ड्राइवर इंतजार कर रहा था।अर्जुन ने वर्दी का कॉलर ठीक किया, टोपी पहनी और तिरंगे की ओर सलामी दी।मीरा ने उनके गले में तिरंगे का एक छोटा सा स्कार्फ बांध दिया।“ये तुम्हारे लिए नहीं, अर्जुन… ये मेरे लिए है। जब तुम वहां होगे, और मैं यहां… तो मुझे लगेगा कि मैं भी तुम्हारे साथ हूं।”अर्जुन ने मुस्कुराकर सलामी दी —“वादा है, मीरा… शाम होते-होते आ जाऊंगा। हम साथ में तिरंगा उतारेंगे।”अर्जुन चले गए, लेकिन मीरा पूरे दिन खाली नहीं बैठी।वो अपने मोहल्ले के बच्चों के साथ झंडारोहण में शामिल हुई, बच्चों को मिठाई बांटी, तिरंगे के रंगों में रंगे पतंग उड़ाए।हवा में पतंग उछालते हुए उसने ऊपर देखा —“अर्जुन… देखो, मैं भी उड़ रही हूं। जैसे तुम्हारा प्यार उड़ता है, मेरे दिल में।”कभी वो बच्चों को देशभक्ति गीत सिखाती, कभी मोहल्ले की औरतों के साथ हंसकर बातें करती। लेकिन बीच-बीच में उसकी नजरें सड़क की ओर चली जातीं — कहीं अर्जुन की जीप दिख जाए।सूरज ढल रहा था। तिरंगे की छांव में सुनहरी किरणें खेल रही थीं।मीरा बालकनी में खड़ी इंतजार कर रही थी। तभी दूर से जीप की आवाज आई… दिल धक-धक करने लगा।अर्जुन उतरकर आए — हल्के से थके, लेकिन चेहरे पर गर्व और जीत का भाव।मीरा सीढ़ियां उतरकर भागी और सीधे उनके गले लग गई —“तुम आ गए…”अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा —“मैंने वादा निभाया, मीरा। चलो, साथ में तिरंगा उतारते हैं।”–दोनों ने मिलकर तिरंगे को धीरे-धीरे उतारा। अर्जुन ने उसे अपनी हथेलियों में समेटा, और मीरा ने उसे सीने से लगा लिया —“ये सिर्फ कपड़ा नहीं… ये तुम्हारा साहस, तुम्हारी जान और मेरा इंतजार है।”अर्जुन ने धीरे से कहा —“और तुम्हारा प्यार, मीरा… जो मुझे हर जंग में जीताता है।”उस शाम, ढलते सूरज और लहराते तिरंगे के बीच, एक फौजी पति और उसकी पत्नी ने महसूस किया — देशभक्ति सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि उन दिलों में भी बसती है… जो इंतजार करते हैं, हंसते हैं और प्यार में मजबूती से खड़े रहते हैं।
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सुबह का वक्त था। 15 अगस्त। पूरा शहर तिरंगे में रंगा हुआ, गलियों में बच्चे झंडियां लहरा रहे थे, कहीं देशभक्ति गीत गूंज रहे थे, तो कहीं स्कूलों में कार्यक्रम की तैयारी थी।पर फौजी कप्तान अर्जुन सिंह राठौड़ के घर का माहौल थोड़ा अलग था।उनकी पत्नी मीरा बालकनी में खड़ी, हवा में झूलते तिरंगे को…








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