“मैं चाहती हूं कि मेरी बेटी  मेहरुन्निसा का रिश्ता शाहरुख से तय हो जाए।”फ़रीदा बानो ने यह बात कहते हुए मिर्जा साहब और अपने भाई  सईद मिर्जा की तरफ देखा।वैसे भी यह बात पहले कई बार चर्चा में आ चुकी थी,और उन्हें पूरा यकीन था कि यह रिश्ता अब पक्का हो ही जाएगा।उनकी बेटी को भी शाहरुख पसंद था।फरीदा बानो ने हमेशा अपनी बेटी से राय लेकर ही ये कदम उठाया था।उनकी बात सुनकर दादी जान हल्के से मुस्कुराईं।”बिल्कुल… जैसे कबीर और हिना का रिश्ता तय किया, वैसे ही इन दोनों की भी सगाई जल्द कर देंगे,”उन्होंने कहा।सभी लोग एक-दूसरे को मुबारकबाद देने लगे।लेकिन तभी कबीर ने कहा,”मुझे लगता है, एक बार शाहरुख से भी बात करनी चाहिए। वह घर पर ही है…”सैयद साहब ने तुरंत जवाब दिया,”वो मेरी बात  मानेगा। जो मैं तय कर दूं, वही होगा।”उनकी बात सुनकर कबीर चुप हो गया।सहसा हिना की नज़रें झुक गईं।इस पूरे माहौल में सबसे ज़्यादा असर हिना पर पड़ रहा था।उसे अंदर ही अंदर दुख हो रहा था।वह खुद शाहरुख को कहीं न कहीं दिल से पसंद करती थी।शाहरुख खुले विचारों वाला, मॉडर्न सोच रखने वाला लड़का था।इसीलिए हिना ही नहीं, घर की कई लड़कियाँ उसकी ओर आकर्षित थीं।अब कबीर का यह कहना कि”एक बार शाहरुख से पूछ लेना चाहिए”हिना के दिल में एक टीस जगा गया।कबीर की अपनी शादी के वक़्त तो कभी उससे नहीं पूछा गया था।इसीलिए कबीर आप ऐसा कह रहा था।—इस माहौल में सबके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन हिना की मुस्कान सबसे झूठी थी।तभी रईस साहब ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,”अभी बात पूरी नहीं हुई। हमें आपसे एक और रिश्ता भी चाहिए…””किसका?” सैयद साहब ने पूछा।”अपने बेटे अरहान के लिए। हमें आपकी बेटी सबिहा का रिश्ता चाहिए। वह हमारे घर आएगी।शादियां अपने खानदान में होनी चाहिए।बाहर की लड़कियों का क्या भरोसा…”फरीद ने बड़ी दृढ़ता से कहा।उसे पूरा यकीन था कि यह रिश्ता कोई मना नहीं करेगा —क्योंकि उसका बेटा अरहान न सिर्फ पढ़ा-लिखा और हैंडसम था,वो एकलौता बेटा, छोटा परिवार — सब कुछ अनुकूल था।जैसे ही साबिहा की शादी की बात चली, वह तुरंत उठकर वहाँ से चली गई। इस घर का नियम था कि जब भी बेटियों की शादी का ज़िक्र हो, वे बातचीत में शामिल न रहें।सुविधा चुपचाप चली गई—क्योंकि उसके मन में साफ़ था कि वह इस वक़्त शादी नहीं करना चाहती। उसका सपना था अपनी पढ़ाई पूरी करना।मगर क्या किसी ने उससे उसकी राय पूछी?इस बात की उम्मीद उसे बिल्कुल नहीं थी।”तीनों की सगाई एक साथ कर देंगे,”दादी जान ने फिर से कहा।लेकिन तभी कबीर बीच में बोल पड़ा,”बिल्कुल नहीं! अभी तो सबिहा से भी पूछना होगा…”सैयद साहब नाराज़ हो उठे,”अब उससे भी पूछना है क्या?साबिहा अभी बहुत छोटी है। उसकी शादी की बात करना अभी सही नहीं है।कबीर ने कहा।और जब हम बड़े बैठे हैं, तो तुम्हारा बीच में बोलना क्या ठीक है?”दादा हाशमी मिर्जा को यह बात नागवार गुज़री कि कबीर ने बड़ों की बातचीत में टोक दिया।कमरे में बैठे सबकी नज़र एक साथ अहमद मिर्जा पर गई (वे कबीर के अब्बा थे)।सैयद साहब ने बात आगे बढ़ाने की कोशिश की:“भाईजान, आप ही कुछ कहिए।”अहमद मिर्जा ने पहले अपने वालिद हाशमी मिर्जा की तरफ देखा, फिर कबीर की ओर मुड़े।धीरे से बोले:“मेरी राय भी कबीर जैसी है। पहले घर के दोनों बेटों की शादियाँ कर लेते हैं, फिर बेटियों की बात करेंगे। ‘साबिहा अभी छोटी है—मुझे लगता है उसे पहले ग्रेजुएशन कर लेने देना चाहिए।”(यह नहीं था कि रिश्ता हमें पसंद नहीं; पर वे कभी अपने बेटे कबीर के खिलाफ न जाते।)तभी फ़रीदा ने ज़रा ऊँची आवाज़ में पूछा:“तो मतलब? रिश्ता पक्का हुआ या नहीं?”अहमद ने संयम रखा:“पहले दोनों भाइयों का निकाह होने दो, फिर सोचेंगे। वो अभी छोटी है—घर कैसे संभालेगी? और मैं नहीं चाहता कि उसकी पढ़ाई बीच में रह जाए।” कबीर फिर बोला।फ़रीदा ने चुटकी ली:“कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें अपने न पढ़ पाने का दुख है, इसलिए बहन को पढ़ाना चाहते हो?”कबीर उठ खड़ा हुआ।“मैं कॉलेज नहीं जा सका तो क्या हुआ? मेरे बाकी भाई-बहन तो पढ़ रहे हैं न! हाँ, मैं अपनी पढ़ाई पूरी न कर पाया—लेकिन मेरी बहन ज़रूर करेगी।”पलभर सन्नाटा रहा।–ऐसा कहते हुए कबीर ने एक नज़र हिना पर डाली। हिना सिर झुकाए अपनी प्लेट में चम्मच से खेल रही थी। जब उसकी शादी की बात चली थी, तब किसी ने नहीं कहा था कि वह पहले पढ़ाई पूरी कर ले। अब कबीर अपनी छोटी बहन साबिहा के लिए पढ़ाई की बात कर रहा था—यह बात हिना को अच्छी भी लगी और कहीं न कहीं चुभी भी।उधर शाहरुख की शादी मेहरुन्निसा से तय होने की चर्चा चल रही थी। हिना के मन में हल्का-सा कसाव था—। हिना बाहर से चुप थी, पर भीतर सुन रही थी—सब कुछ, बहुत ध्यान से।—कबीर उठ खड़ा हुआअचानक कबीर उठा।“मैं गौतम के साथ दिल्ली जा रहा हूँ। शायद कल तक लौटूँ,” उसने कहा और अपने कमरे की तरफ चला गया—शायद कुछ सामान लेने।—फ़रीदा का ग़ुस्साकबीर के जाते ही फ़रीदा  रुकी नहीं। ग़ुस्से में बोली:“मैं तो अरहान के लिए साबिहा का रिश्ता मांगने आई थी—इतना अच्छा लड़का, इसी घर का दामाद बन जाता! लेकिन अब? इस बेइज़्ज़ती के बाद मैं दूसरी बार रिश्ता लेकर नहीं आऊँगी!”रईस साहब ने धीरे से समझाया:“कोई बात नहीं… अपना ही बच्चा है।”पर बात फ़रीदा को लग चुकी थी।—दादी-जान को अच्छा नहीं लगा—उन्हें लगा उनकी बेटी (फ़रीदा) का दिल दुख गया।उन्होंने दादा-जान की ओर देखा:“आप घर के बड़े हैं। जो आप कहेंगे वही होगा…बाद में बात कर लेंगे।”दादा-जान ने बात सँभालना चाहा। वे जानते थे—कबीर की बात पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं। वह सीधे बोलता है, पर घर की आर्थिक रीढ़ भी वही है। काम सब करते हैं, पर असली ज़िम्मेदारी उसी पर है—और उसका गुस्सा भी कम नहीं।घर की बहुएँ चुप थी।तीनों भाइयों की बीवियाँ —सलीमा भाभी (कबीर की अम्मी),शगुफ़्ता भाभी (हिना की अम्मी),और रिहाना भाभी (तैमूर की अम्मी) —तीनों औरतें खाने की सर्विंग में लगी हुई थीं।वे जानती थीं कि दादा-जान और दादी-जान के सामने उनकी चलती नहीं। ऊपर से नंद फ़रीदा भी आई हुई थी—इसलिए बेहतर समझा कि परिवार के बुज़ुर्ग ही फ़ैसला लें।


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