जब एक हफ़्ते बाद कबीर घर लौटा, तो बहुत कुछ बदल चुका था। उसकी सोच से कहीं बड़े फैसले हो चुके थे। शायद कुछ बातों का उसे पहले ही अंदाज़ा था, क्योंकि घर का बिज़नेस और फैक्ट्रियों का बंटवारा होने वाला था। उनकी बाकी की प्रॉपर्टी का भी हिसाब-किताब तय किया जा रहा था। सबसे बड़ी बात कबीर और हिना की सगाई के साथ दोनों का निकाह भी होना था। कबीर एक हफ्ते के बाद घर पहुँचा। शाम ढल चुकी थी। गौतम उसे मुख्य गेट तक छोड़कर चला गया। बिज़नेस की उलझनों से घिरा, वह सीधे अंदर बढ़ा। जिस काम के लिए वह बाहर गया था—एक दिल्ली के बिजनेसमैन के साथ होटल पार्टनरशिप—वह बीच में अटका पड़ा था; न पूरी हाँ हुई थी, न साफ़ इनकार।घर के बड़े हाल में कदम रखते ही वह ठिठक गया। पूरी फैमिली वहाँ इकट्ठी थी! आम तौर पर इस समय घर के मर्द काम पर बाहर होते हैं और देर शाम लौटते हैं, मगर आज सब मौजूद थे—अब्बा अहमद मिर्ज़ा, दोनों चाचा जान, अम्मी, दोनों चचियाँ, शाहरुख, तैमूर, सबीहा, कहकशा, हिना, हवा… सब।“लो, भाईजान आ गए!” शाहरूख ने मुस्कराकर कहा।कबीर ने हल्का सा सलाम किया। दादा जान ने पास की सोफ़ा-सीट थपथपाई। “आओ, बैठो।”कबीर बैठा तो धीमे से बोला, “आज सब लोग काम पर नहीं गए? कुछ हुआ क्या?… कहीं बँटवारे का प्रोग्राम कैंसल तो नहीं हो गया?”सईद चाचा ने कहा, “काम पर गए थे, बेटा… लेकिन तैयारी भी करनी है। तीन-तीन दिन में शादियाँ हैं घर में!”कबीर हँस पड़ा। “तीन नहीं—दो ही तो हैं! शाहरूख और मेहरुन्निसा… हमारी तो बस सगाई है।” उसने हिना की तरफ देखा। लड़की ने सिर झुका रखा था।तैमूर ने मुस्कुराकर कहा, “यही तो सरप्राइज़ है आपके लिए!”“सरप्राइज़? क्या मतलब?”“मतलब ये कि—शाहरूख भाई और मेहरुन्निसा भाभी की शादी पक्की। अहमर और कहकशा आपा का निकाह। और…” उसने नाटकीय विराम लिया, “आपका और हिना का निकाह भी साथ में!”कबीर का चेहरा सख़्त हो गया। एक ही साथ इतने फैसले?“कहकशा का निकाह… अहमर के साथ?!” (उसे यक़ीन न हुआ—उसने सईद चाचा की ओर देखा।)सईद बोले, “देखो कबीर, बुरा मत मानना। तुमने साबिहा के लिए पहले मना कर दिया था, तो तो यह रिश्ता कहकशां के लिए आ गया… और घर-बार बहुत अच्छा है। मैंने हाँ कह दी।”“लेकिन उसकी पढ़ाई?” कबीर ने टोका।“अरे, अपनी पढ़ाई की चिंता तुम बाद में करना,” किसी ने बात बदल दी। मगर मुझे अभी निकाह नहीं करना, मैंने टाइम मांगा था आपसे। कबीर ने थोड़े गुस्से से कहाकबीर ने अब्बा की ओर देखा। अहमद मिर्ज़ा ने नज़र से ही समझा दिया—मान लो।दादा जान ने नरमी से कहा, “बेटा, तुम घर के सबसे बड़े हो, और हिना सबसे बड़ी बेटी। जब तक तुम दोनों का निकाह नहीं होगा, छोटों का कैसे करेंगे? रुख़सती बाद में रखना—तुम्हारी मर्ज़ी। लेकिन निकाह ज़रूरी है।”कबीर ने लगभग फुसफुसाकर कहा, “मुझे थोड़ा टाइम चाहिए था…”पर वह जानता था—इतने लोगों के बीच उसकी बात नहीं चलेगी। अब्बा की आँखों के इशारे ने फैसला पक्का कर दिया।“ठीक है,” वह उठते हुए बोला, “आप लोग जैसा सही समझें। मैं बहुत थक गया हूँ… ज़रा फ्रेश हो लूँ?” और वह हाल से बाहर चला गया।सिर्फ एक हफ़्ता बचा था सगाई और निकाह में। उधर बिज़नेस डील अटकी हुई। अपनी शादी वह दो साल बाद करना चाहता था, और यहाँ सब कुछ तुरंत!कबीर के उठकर जाने का ढंग सबको चुभ गया—पर सबसे ज़्यादा चोट हिना को लगी। जिस इंसान को मेरे साथ निकाह में दिलचस्पी ही नहीं… उसके साथ ज़िंदगी कैसे कटेगी? क्या वह बस नाम की बीवी बनकर रह जाएगी? कबीर की लाइफ़ में उसकी कोई अहमियत होगी भी या नहीं?हिना ने अपने घर-ख़ानदान में कई औरतों को देखा है जिनके शोहर उन्हें पूछते ही नहीं। ऐसी औरतों को न घर में इज़्ज़त मिलती है, न बाहर। उसका गला भर आया। सबकी नज़रों से बचते हुए उसने चुपके से आँसू पोंछे। अब उसके दिल में उम्मीद की लौ बहुत धीमी पड़ चुकी थी।घर में शादी और निकाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो चुकी थीं। हिना ने बड़ी बेदिली से अपनी सगाई और निकाह का जोड़ा फाइनल किया था। उसके मन में अब कोई चाह या उत्साह नहीं बचा था। वह बस अपने अब्बा और अम्मी के सामने सब कुछ ठीक होने का दिखावा कर रही थी।हवा उसके मन की हालत को समझती थी। अक्सर वह हिना से कहती,“आप दिल छोटा मत करो। कबीर भाईजान आपको बहुत चाहते हैं।”हिना बस हल्का सा मुस्कुरा देती और चुप हो जाती।मेहरुन्निसा और कहकशां अपनी शॉपिंग में मग्न थीं। उनकी सगाई, निकाह और रुख़सती भी एक साथ होने वाली थी। मेहरुन्निसा को मिर्ज़ा खानदान में आना था, जबकि कहकशा की रुख़सती के बाद वह हुसैन रिज़वी के बेटे के साथ उनके खानदान में जाएगी।शाहरुख भी अपनी शादी की तैयारियों में बड़े शौक से लगा हुआ था। जब कबीर से उसके निकाह और शादी के कपड़ों के बारे में पूछा गया, तो उसने साफ़ कह दिया,“मैं अपने कपड़े खुद बनवा लूँगा।”इन सब तैयारियों के बाद घर में एक और बड़ा फैसला लिया जाना था—फैक्ट्रियों और प्रॉपर्टी का बँटवारा। यह सब कुछ लगभग तय हो चुका था। बस शादी का खर्चा सही तरीके से सँभालकर रखने की बात पर सभी का ध्यान था।—निकाह का दिनसगाई के अगले ही दिन निकाह की तैयारियाँ तेज़ हो गईं। घर का माहौल उत्सव जैसा था, मगर कबीर के मन में हलचल मची थी। वह सोच रहा था कि कहकशा का रिश्ता अहमद के साथ सही नहीं है। अहमद के बारे में कुछ बातें वह जानता था जो पूरे खानदान में किसी को नहीं पता थीं। वह ये बातें बताना चाहता था, मगर डरता था कि लोग यह न समझ लें कि वह जान-बूझकर इस रिश्ते में रुकावट डाल रहा है।वह घर का सबसे बड़ा बेटा था, जिम्मेदारियों का बोझ उसके कंधों पर था, फिर भी किसी ने उससे न तो राय ली और न ही उसके अपने निकाह के बारे में पूछा।हिना पीच कलर के खूबसूरत जोड़े में सजी बैठी थी। आज उसका निकाह था। ऊपर से मुस्कुराती दिख रही थी, मगर उसका दिल जानता था कि आज उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला हो रहा है — एक ऐसे इंसान के साथ जिसका दिल कभी उसकी तरफ़ नहीं झुका।कहकशा लाल जोड़े में थी और बेहद खुश नज़र आ रही थी। उसकी आँखों में शादी का खुमार साफ़ दिखता था। उधर मेहरुन्निसा सबसे ज्यादा खुश थी, क्योंकि उसका रिश्ता शाहरुख से उसकी अपनी मर्जी से तय हुआ था। शाहरुख भी उसे पसंद करता था। मेहरुन्निसा मजेंटा (रानी कलर) जोड़े में बेहद खूबसूरत लग रही थी।—निकादोपहर की नमाज़ के बाद निकाह की रस्में शुरू हुईं। पहले कबीर और हिना का निकाह हुआ। कबीर मिर्ज़ा को क़ाज़ी साहब ने सवाल किया,“कबीर अहमद मिर्ज़ा, क्या आप हिना वकार मिर्ज़ा को अपनी बीवी के रूप में स्वीकार करते हैं?”कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा,“क़बूल है।”तीन बार क़बूल है कहने के बाद दुआएँ पढ़ी गईं। हिना के कमरे में भी यही सवाल दोहराया गया,“हिना वकार मिर्ज़ा, क्या आप कबीर अहमद मिर्ज़ा को अपना शौहर मानती हैं?”हिना की आँखें नम थीं, मगर उसने भी जवाब दिया,“क़बूल है।”यूं दोनों का निकाह मुकम्मल हुआ।—कबीर और हिना के निकाह के बाद शाहरुख और मेहरुन्निसा का निकाह हुआ। उनकी मुस्कुराहटों और खुशी ने पूरे माहौल को हल्का और रौशन कर दिया।कहकशा का निकाह अहमर के साथ संपन्न हुआ। अहमर ने भी बिना किसी झिझक के क़बूल है कहा। कहकशा के चेहरे पर खुशी साफ़ दिख रही थी, मगर कबीर के मन में एक बोझ था। उसे लग रहा था कि शायद यह रिश्ता कहकशा के लिए सही नहीं होगा, मगर अब वह कुछ नहीं कर सकता था।पाठकों से गुज़ारिश अगर आपको यह सीरीज़ पसंद आ रही है तो कमेंट ज़रूर करें, अपनी रेटिंग दें, और मुझे फ़ॉलो / वोट करना न भूलें। आपका फ़ीडबैक मुझे आगे लिखने की ताक़त देता है!—4
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जब एक हफ़्ते बाद कबीर घर लौटा, तो बहुत कुछ बदल चुका था। उसकी सोच से कहीं बड़े फैसले हो चुके थे। शायद कुछ बातों का उसे पहले ही अंदाज़ा था, क्योंकि घर का बिज़नेस और फैक्ट्रियों का बंटवारा होने वाला था। उनकी बाकी की प्रॉपर्टी का भी हिसाब-किताब तय किया जा रहा था। सबसे…







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