तीन निकाह हो चुके थे। प्रोग्राम के लिए शहर का सबसे खूबसूरत और सबसे बड़ा हॉल बुक किया गया था। आखिरकार, मिर्ज़ा खानदान की तीन शादियाँ एक साथ हो रही थीं। हॉल में रोशनी की जगमगाहट थी, हर तरफ गहमा-गहमी और शोर-शराबा — हँसी, ठहाकों और मेहमानों की बातचीत से हॉल की रौनक दोगुनी हो गई थी। कहकशां और मेहरुन्निसा की रुख़सती आज ही होनी थी। लेकिन हैना और कबीर का सिर्फ निकाह हुआ था, उनकी रुख़सती बाद में तय थी। मेहमान बड़ी तादाद में आए हुए थे। सजावट से लेकर खाने तक हर चीज़ शाही अंदाज़ की गवाही दे रही थी। कबीर का चेहरा मगर उदास और बुझा हुआ था। वह कोने में बैठे-बैठे चुपचाप सब देख रहा था। जब से वह दिल्ली से वापस आया था, उसका मूड खराब था। यह निकाह का मौका उसकी खुशी का दिन होना चाहिए था, मगर न जाने क्यों, उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी। तीन निकाह पूरे हो चुके थे और मिर्ज़ा खानदान की शाही दावत अभी पूरे शबाब पर थी। हॉल अभी भी मेहमानों, रोशनी और बधाइयों से भरा था। कहकशाँ और उरूज की रुख़सती आज ही होनी थी; हिना और कबीर का निकाह हो चुका था लेकिन उनकी रुख़सती बाद में तय थी। सब खुश थे—सिवाय कबीर के। कबीर के चेहरे पर थकान, तनाव और भीतर जमा बेचैनी साफ़ झलक रही थी। जब से वह दिल्ली से लौटा था, उसका मूड ठीक नहीं था। वजह? वो होटल। — कबीर उस होटल को खरीदने पर अड़ा हुआ था। डील छोटी नहीं थी—काफी बड़ा इन्वेस्टमेंट चाहिए था, जो वह अकेले जुटा नहीं सकता था। इसलिए उसने पार्टनरशिप का रास्ता चुना। दिल्ली में एक सांसद थे—सांसद अहमद रियाज़, मूलतः राजस्थान से ताल्लुक रखते थे। उनका बेटा सिकंदर रियाज़ हाल ही में विदेश से एमबीए कर के लौटा था और पिता उसे बिज़नेस में उतारना चाहते थे। होटल इंडस्ट्री में एंट्री लेने के लिए उन्हें एक जमीनी, समझदार, लोकल-नेटवर्क वाला पार्टनर चाहिए था—और उन्हें कबीर सही लगा। मगर बातें अटकी रहीं। न साफ़ “हाँ”, न साफ़ “ना”। इक्विटी, मैनेजमेंट कंट्रोल, पुराने बकाए, और रेवेन्यू-शेयर जैसी कुछ शर्तें थीं जिन पर भरोसा (trust) बन ही नहीं पा रहा था। पिछले कुछ दिनों से कबीर लगातार फोन पर उन्हीं लोगों से बात कर रहा था। — निकाह की रस्में ख़त्म होने के बाद कबीर मेहमानों से मिल तो रहा था, मगर बार-बार उसका हाथ जेब में पड़े फोन पर जाता। तभी फोन वाइब्रेट हुआ—दिल्ली का नंबर। उसने भीड़ से थोड़ा हटकर कॉल उठाई। दूसरी तरफ़ से संदेश साफ़ था: > “सांसद साहब और सिकंदर अभी जयपुर के रास्ते पर हैं। अगर आप आज रात मिल कर टर्म्स क्लोज़ करना चाहते हैं तो अभी निकलिए। वरना तारीख आगे खिसक जाएगी — और फिर ये मौका महीनों बाद मिलेगा।” कबीर की धड़कन तेज़ हो गई। उसने तुरंत गौतम की तरफ़ देखा। बस एक इशारा — चलो! — कबीर तेज़ क़दमों से मैरिज पैलेस के पिछले गेट की तरफ़ बढ़ा। गौतम अपनी गाड़ी निकालने लगा। इतने में पीछे से आवाज़ आई: “कबीर! इस वक़्त कहाँ जा रहे हो? तुम्हारा अभी-अभी निकाह हुआ है!” ये उनके अब्बा, अहमद मिर्ज़ा थे। चेहरा चिंता से भरा। कबीर पलटा, आगे बढ़ा, अब्बा के हाथ छुए। “अब्बा, दुआ कीजिए। मैं होटल की डील फाइनल करने जा रहा हूँ। ये मौका हाथ से गया तो फिर नहीं मिलेगा। मैं लौटा तो खुशखबरी लेकर आऊँगा।” “लेकिन अभी? लोगों के बीच से उठकर जाना अच्छा नहीं लगता!” “मुझे अभी जाना होगा। बाद में समझाऊँगा, वादा।” बात ख़त्म। वह बैठा, गौतम ने गाड़ी बढ़ा दी। – कुछ ही मिनटों में ये खबर हॉल के दूसरे हिस्से—जहाँ दुल्हनें और घर की खवातीन बैठी थीं—तक पहुँच गई: “कबीर अभी-अभी मैरिज पैलेस से निकल गया!” “क्या हुआ?” फूफ़ी” फरीदा ने भौंहें चढ़ाईं। उन्हें तर्ज़ीह ड्रामे में ही मिलती थी। — फूफ़ी फरीदा की तंज़भरी गोलाबारी फूफ़ी फरीदा ने हिना और उसके पास बैठी सबीहा पर नज़र डाली और दबी मुस्कान के साथ बोलीं: “देखा? मैंने पहले ही कहा था—ये लड़का किसी को भी पूरा भरोसा नहीं देगा। निकाह के दिन ही बिना बताए चला गया! बेटी, तुम पूरी उमर ऐसे ही इंतज़ार करती रहो तो?” हिना का चेहरा तमतमा गया। सामने कहकशाँ की तरफ़ से हँसी की आवाज़ आई—वो अपनी रुख़सती की तैयारियों से खुश थी; तुलना में हिना और भी असहज लगने लगी। फूफ़ी ने आग में घी डाला: “और सुनो सब—मैं तो चाहती थी कि सबीहा हमारे घर आये… किस्मत देखो! कहकशाँ बैठी हैं दुल्हन बनकर, और इस कबीर मियां को देखो—दुल्हन को छोड़ डील के पीछे भागे जा रहे हैं।”फरीदा को लगता था कि जो लड़की उसके बेटे की दुल्हन बनकर आएगी, उसकी किस्मत खुल जाएगी ।मगर यह तो वक्त ही बताने वाला था कि क्या होगा। सबीहा ने झेंपकर नज़रें झुका लीं। बात का असली निशाना फिर भी हिना ही थी। — इसी तनाव भरे माहौल में, छोटी-सी, चुलबुली हवा दौड़ती हुई आई। सबकी नज़रें उस पर जा टिकीं। हवा हांफती हुई बैठी और हिना के हाथ में फोन थमा दिया। स्क्रीन पर कबीर का मैसेज खुला था: > “माफ़ कीजिएगा, बेगम साहिबा। मुझे अचानक जाना पड़ा—बहुत ज़रूरी था। अगर आप मेरे नसीब में हैं, तो समझिए मेरा नसीब भी खुलने वाला है। जो डील इतने दिनों से अटकी थी, आज पार्टनरशिप की बात आगे बढ़ गई है। दुआ कीजिए, मैं ये होटल लेकर ही लौटूँगा। ❤️” हिना का चेहरा—जो अभी पल भर पहले शर्म और ग़ुस्से से तपा था—धीरे से नरम पड़ने लगा। उसने हल्की मुस्कान रोके हुए मैसेज पढ़ा। सभी लोग आपस में बातों में व्यस्त थे, किसी का ध्यान हवा और हिना की तरफ नहीं था। कबीर का मैसेज पढ़ने के बाद हिना, जो अब तक अपने मन में कई भारी बातें लिए बैठी थी, एकदम हल्का महसूस करने लगी। ऐसा नहीं था कि उसके मन में कबीर के लिए कोई खास भावना थी, मगर जो भी था, कबीर ने उसे अहमियत दी थी—ये बात उसके दिल को छू गई थी। “क्या सोच रही हो? भाईजान को बेस्ट ऑफ लक का मैसेज तो भेज दो,” हवा ने मुस्कुराते हुए कहा। “ठीक है, भेज दिया,” हिना ने धीरे से जवाब दिया और मैसेज टाइप कर भेज दिया। — गौतम गाड़ी चला रहा था, कबीर फोन पर टाइप कर रहा था। “किसे मैसेज?” गौतम ने पूछा। “बेगम साहिबा को।” कबीर आज खुलकर मुस्कुराया। “निकाह के दिन ही गुलामी शुरू?” “हम तो कब से उनके गुलाम हैं, बस आज बताने का टाइम मिला है!” उसी वक़्त हवा का जवाब आया। कबीर ने पढ़ा और हँसी रोक न सका। “इस लड़की से मेरी कोई प्राइवेसी नहीं रह सकती! बेगम तक मैसेज पहुँचे उससे पहले हवा पढ़ लेती है!” गौतम ने कहा, “चलो अच्छा है—कम से कम घरवालों को पता चल जाएगा कि तुम भागे नहीं, बिज़नेस की जंग लड़ने निकले हो!” कबीर ने फोन सीने पर रख लिया। आँखों में चमक आ गई थी—वो वही जुनून था जो उसे इस होटल के पीछे भागा रहा था। “ये डील हुई तो सिर्फ़ बिज़नेस नहीं, मेरे और हिना के आने वाले घर की बुनियाद होगी।” — हिना ने फोन वापस पर्स में रखा। चेहरा अभी भी लाल था, मगर अब शर्म व गुस्से से नहीं—उम्मीद से। उसने धीरे से कहा, “अल्लाह करे, ये होटल तुम्हें मिल जाए कबीर…” उधर फूफ़ी फरीदा फिर बोलने को हुईं, । अब कोई कुछ भी बोले पर कबीर ने हिना को मैसेज दे दिया था कि वह कहां जा रहा है और हिना को यह बात सभी को बताने की जरूरत नहीं थी ।शायद निकाह होते ही एक नए रिश्ते की शुरुआत हो चली थी।








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