मुझे चेंज करना है। जानवी जानबूझकर उसे इग्नोर करती हुई ड्रेसिंग रूम में गई और अलमारी खोलकर अपने कपड़े निकालने लगी। वह उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने पीछे से उसके पेट पर अपनी बाहें डाल लीं और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला,
“क्यों इग्नोर करती हो यार मुझे?”
फिर उसने जानवी की गर्दन पर किस किया।
“जय,” जानवी ने कहा। उसकी आँखें बंद होने लगी थीं। जय की नज़दीकी उसके लिए इतनी जानलेवा थी, उसने सोचा नहीं था।
जय ने उसे दोनों कंधों से पकड़कर अपनी ओर घुमा लिया। जानवी ने नज़रें नीचे ही झुकाए रखीं। उसने जय के चेहरे की तरफ नहीं देखा।
“तुमने ऐसे नज़रें क्यों झुका रखी हैं? मेरे चेहरे की तरफ देखो।”
मगर वह नज़रें झुकाए जमीन की तरफ देख रही थी। उसने जानवी का ठोड़ा पकड़ा और ऊपर की ओर किया। जानवी ने अपनी नज़रें उठाकर जय की तरफ देखा। उसे जय की आँखों में बेशुमार प्यार नज़र आ रहा था। वह हल्का सा मुस्कुराई और उसने जय के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। जानवी ने अपनी दोनों बाहें जय की पीठ पर डाल दीं। जय ने भी उसे अपनी बाहों में समेट लिया।
“तो मेरी छोटी सी बीवी को शर्म आ रही है?”
“हाँ,” जानवी ने धीरे से कहा।
“मुझे सुनाई नहीं दिया। ज़रा ऊँची बोलो।”
“हाँ।” इस बार वह ज़रा सा ऊँची बोली।
“तुम बहुत प्यारी लग रही हो।” उसने जानवी का चेहरा पकड़ा और उसका माथा चूमा। फिर जय उसके होंठों की तरफ झुकने लगा। जानवी के दिल की स्पीड इतनी तेज हो गई। जानवी का दिल इतनी जोर-जोर से धड़कने लगा कि जय को बाहर तक सुनाई दे रहा था।
“तुम्हारा दिल इतनी जोर से क्यों धड़क रहा है?” उसने पूछा।
जानवी ने अपना हाथ अपने दिल पर रखा।
“बस ऐसे ही।”
जय बिल्कुल उसके होठों के नज़दीक पहुँच गया। जानवी उसकी साँसों को अपने चेहरे पर महसूस कर सकती थी। तभी बेडरूम में जानवी का फ़ोन बजा। जय किस करते हुए रुक गया।
“मैं फ़ोन उठा लूँ,” जानवी ने कहा।
वह भी इस सिचुएशन से भागना चाहती थी।
“उठा लो भाई, कभी तुम्हारा लाडला जाता है तो कभी दादाजी का फ़ोन है।” उसने फ़ोन देखकर कहा।
“कैसे हो बेटा?” जानवी के दादा जी ने पूछा।
“मैं ठीक हूँ। आप बताइए।”
“बस आज मैं हॉस्पिटल गया था चेकअप के लिए।”
“आप ठीक तो हैं दादा जी?” जानवी को फ़िक्र हुआ।
“हाँ बेटा। मैं ठीक हूँ। बस रूटीन चेकअप के लिए गया था। वहाँ पर मुझे तुम्हारी डॉक्टर मिली थी। उसने कहा कि तुम शादी के बाद एक बार भी हॉस्पिटल नहीं आई। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ खा रही हो। एक बार तुम्हें मिलना चाहिए था।” दादा जी उसकी फ़िक्र कर रहे थे।
“नहीं दादाजी। मैंने शादी के बाद दवाई खाई ही नहीं। मुझे तो आज याद आया जब आपने कहा। मुझे दवाई की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।”
उसकी बात पर दादाजी मुस्कुराए।
“तो ठीक है बेटा। मैं तो डर गया कि तुम ऐसे ही दवाइयाँ खा रही हो। यह तो अच्छी बात है बेटा कि तुम्हें पैनिक अटैक नहीं आया।”
“मेरी भी जय से बात कराना।” दादा जी ने कहा।
“यह लीजिए।” जानवी ने फ़ोन पकड़ा दिया। “आप जय से बात कीजिए।”
“कैसे हैं दादा जी आप? आपकी सेहत कैसी है?” वह पूछने लगा।
“मैं अब ठीक हूँ। मैं कह रहा था मुझे कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना है। हरिद्वार जा रहा हूँ, अगर आप जानवी को दो-तीन दिन के लिए वहाँ भेज दो तो मुझे अच्छा लगेगा।”
“क्या?” जय ने कहा। वह जानवी को भेजना नहीं चाहता था। दादा जी की बात पर जय ने जानवी की तरफ़ देखा।
जानवी ने इशारे से पूछा, “क्या हुआ?”
“ठीक है दादा जी।”
“तो ठीक है बेटा। मैं थोड़ी ही देर में आ रहा हूँ। असल में मैं बाहर था, तो घर जाते हुए उसे ले जाऊँगा।”
“अभी?” जय ने पूछा।
“हाँ अभी।”
“ठीक है आ जाइए।” जय को ना चाहते हुए भी हाँ कहना पड़ा।
“क्या हुआ?” जानवी ने पूछा।
“दादाजी तुमहें लेने आ रहे हैं।”
“क्या? आप मना कर देते!” जानवी के मुँह से निकल गया।
वह मुस्कुराया। “चलो अच्छी बात है तुम्हें हमारी कंपनी पसंद आई। चली जाओ उन्हें हरिद्वार जाना है। फिर उन्होंने कहा कि वहाँ पर वह कई दिन लगाकर आएंगे। उनका बड़ा मन है तुम उनके पास रहो। तैयार हो जाओ।”
“मैं युग को साथ ले जाती हूँ।” जानवी ने कहा।
“मैं बिल्कुल अकेला हो जाऊँगा। तुम भी चली जाओगी और वह भी चला जाएगा। उसे को रहने दो मेरे पास।”
“डिप्रेशन की दवाई तुम रोज़ खाती थी?” जय ने पूछा।
“हाँ, सुबह और शाम को। ज़रूरत पड़ने पर कभी भी ले लेती थी। मगर शादी के बाद मैंने नहीं खाई।”








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