सितारों से आगे एपिसोड 44

5–8 minutes

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रेणुका अपनी दोनों सहेलियों के साथ बैठी अपनी जिंदगी के बारे में सोच रही थी। “उसी का असिस्टेंट है, मेरी दोस्त की जिंदगी तो बर्बाद हो चुकी है। अब मैं किसी के साथ शादी करके अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करने वाली। मुझे खुद के पैरों पर खड़ा होना है और अकेले रहना है। और इन दो बेवकूफ की भी हेल्प करनी है मुझे।”

“चाहे जो हो जाए, मैं शादी कभी किसी से नहीं करूंगी,” रेणुका इस बात से अनजान थी कि कोई उसकी गुस्से पर ही मर गया था। वह उसका पीछा कैसे छोड़ेगा?

रेणुका के दादाजी और चाचा जी आ गए थे। उन्हें रेणुका से पूरी बात पता चल चुकी थी। रेणुका की बात सुनकर उसके दादाजी काफी टेंशन में थे। वे डॉक्टर से मिलने चले गए।

“आज रात तो यही रहना था। डॉक्टर ने यही कहा, उसकी सेहत के लिए अच्छा होगा क्योंकि उसका बीपी भी डाउन था।”

डॉक्टर को प्रीति को दिखाने के बाद प्रदीप मेहता घर आ गया था। उसे कोई काम था। उसने घर जाकर जयराज को फोन किया। जयराज के फोन पर रिंग जाती रही, मगर उसने फोन नहीं उठाया। उसे काफी फिक्र हुई क्योंकि ऐसा नहीं होता था। जयराज फोन काट देता है, अगर उसे फोन नहीं उठाना होता, फिर कोई मैसेज या व्हाट्सएप मैसेज करता है। आज सिर्फ बेल जा रही थी।

प्रदीप मेहता ने जयराज के सिक्योरिटी इंचार्ज को फोन किया।

“सर कहाँ हैं? फोन नहीं उठा रहे।”

“नहीं, हम लोग साथ नहीं हैं। सर शायद कहीं अकेले ही गए हैं,” सिक्योरिटी इंचार्ज ने बताया।

“तो क्या मैडम भी साथ में हैं?” प्रदीप मेहता ने पूछा।

“नहीं, मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता,” उसने कहा।

प्रदीप मेहता ने जानवी के फोन पर फोन किया। जानवी का फोन रेणुका के पास था। प्रदीप मेहता का नंबर देखते हुए रेणुका ने फोन उठा लिया।

“भाभी, सर फोन नहीं उठा रहे,” प्रदीप मेहता ने सवाल किया क्योंकि उसे जयराज की फिक्र हो रही थी।

“नशे में पड़े आदमी को कहाँ होश होगा कि उसके फोन पर बेल आ रही है! आयाशी की जा रही है! जानवी से क्या पूछते हो तुम?” रेणुका उसे गुस्से से बोली।

“आप रेणुका जी बोल रही हैं?” उसे उसकी आवाज की पहचान आ गई थी।

“हाँ, मैं वही बोल रही हूँ,” रेणुका ने गुस्से से कहा।

“क्या हुआ? क्या कह रही हैं आप?” प्रदीप मेहता ने पूछा। उसे रेणुका की बात का मतलब समझ नहीं आया था।

“सर कहाँ हैं इस वक्त?” प्रदीप मेहता ने सवाल किया क्योंकि वह सिर्फ जयराज के बारे में जानना चाहता था।

“वह होटल के कमरे में नशे में पड़ा है,” रेणुका ने सारी बात बताई।

उसकी बात सुनकर प्रदीप मेहता के होश उड़ गए। उसे जयराज की सिक्योरिटी की फिक्र होने लगी। जयराज की हर बात उसे पता थी, उसके नाइट स्टैंड भी कितने सीक्रेटली रहे थे, यह उसे पता था। किसी को कानों-कान खबर नहीं होती थी और अब तो वह जानवी को जान से ज्यादा चाहता था। इसीलिए जानवी की वजह से वह उसकी और प्रीति की शादी में इंवॉल्व हुआ था।

जानवी के चाचा जी थोड़ी देर वहाँ बैठे।

“तो फिर पिताजी, आप रहेंगे या चलेंगे?” उसके चाचा जी ने पूछा।

“तुम नहीं रुकोगे क्या?”

“देखिए, मुझे सुबह ऑफिस भी जाना है। मैं रात को यहाँ नहीं रह सकता।”

“तो तुम बहू को भेज देना। वह जानवी के पास रह जाएगी और रेणुका को ही घर जाना होगा।”

“अब देखिए पिताजी, इसकी शादी कर दी है हमने। तो अब कब तक इसकी जिम्मेदारी उठाएँगे हम? हो सकता है जयराज इस बात से नाराज़ हो जाए कि जानवी वहाँ रह रही है। आप अच्छे से जानते हैं, अभी हमने उसके साथ प्रोजेक्ट शुरू किया है। मुझे लगता है जानवी को इस वक्त अपने घर जाना चाहिए। अपने परिवार को संभालना चाहिए,” उसके चाचा जी ने कहा और चुपचाप उठकर वहाँ से चले गए।

उसके दादाजी परेशानी में वहीं बैठ गए थे। जहाँ वे खुश थे कि जानवी अपने परिवार के साथ सुखी है, अब वे हरिद्वार जाने वाले थे, मगर अब तो एक नई प्रॉब्लम खड़ी हो चुकी थी।

“दादाजी, मैं यहीं हूँ, मेरी घर पर बात हो चुकी है। आप फिक्र मत करो। आप भी घर जाओ, सुबह आ जाना।”

“नहीं बेटा, मैं नहीं जाऊँगा।”

उन दोनों की आवाज सुनकर जानवी की आँख खुल गई थी।

“मैं दादा जी से कह रही थी कि हॉस्पिटल में हूँ, रात को तुम्हारे पास।”

“नहीं, मैं भी घर चलूंगी। अब मैं ठीक हूँ, दवाई ले ली है,” जानवी बेड पर से खड़ी होने लगी। “चलिए दादाजी, घर चलें।”

“बेटा, हम सुबह ही चलेंगे, तुम हॉस्पिटल में रहो। रात को कोई प्रॉब्लम ना आ जाए,” उसके दादाजी को टेंशन थी कि अब जानवी को लेकर घर में क्लेश होगा। वह जानवी को जयराज के पास भी नहीं भेज सकता था, घर भी नहीं ले आ सकता था। रात को रेणुका ने दादाजी को जबरदस्ती घर भेज दिया था और वह खुद उसके पास रुक गई थी।

“क्या सोच रही हो जानवी?” रेणुका ने उससे पूछा क्योंकि जानवी किसी गहरी सोच में छत की तरफ देख रही थी।

“अब मैं कहाँ जाऊँगी? मुझे वहीं वापस जाना होगा,” जानवी ने रेणुका से कहा।

“तुम ऐसा क्यों कह रही हो? मैं अभी जिंदा हूँ तो मेरे साथ मेरे घर चलो।”

“मेरे साथ जयराज ने ऐसा क्यों किया? वह तो मुझसे प्यार का दावा करता था।”

“वह ऐसा ही था। उसे तुम चाहिए थीं, वह मिल गईं। अब तुम्हारी अहमियत खत्म। आयाश आदमी है वह एक नंबर का। हमने गूगल पर क्या सर्च किया था, उसे दिन होटल में क्या देखा था हमने? भूल गई।”

“मगर फिर भी मुझे यकीन नहीं हो रहा।”

“तो उससे पूछना चाहती हो तुम? बना देगा वह कोई कहानी।”

“बात तो तुम्हारी सच है। जो मैंने आँखों से देखा है वह सच्चाई किसी हाल में नहीं बदल सकती। सच हमेशा सच रहेगा। उस घर मैं नहीं जाऊँगी, चाहे जयराज मुझे लेने आए।”

दोनों सहेलियाँ आधी रात तक इसी बात पर चर्चा करती रहीं। जानवी कितनी बार रोई।

“तुमने प्रीति को तो नहीं बताया ना?”

“नहीं, प्रीति अपनी टेंशन में परेशान है! उसकी लाइफ में इतना सब हुआ है। क्या बताऊँ मैं उसे?”

“सही किया, प्रीति को फोन मत करना,” जानवी ने कहा।

“मुझे डर लग रहा है जानवी,” रेणुका कहने लगी।

“किस बात का?”

“तुम दोनों की लाइफ में एक ही दिन में कितना कुछ हो गया। अब मेरी बारी है।”

“क्या पागल हो गई हो क्या? यह हुआ, वह इत्तेफाकन हुआ। तुम्हारी लाइफ में सब सही होगा और हाँ, मैं तो भूल ही गई हूँ जिस लड़के से हम मिलने गए थे। वह तो बीच में रह गया।”

“उसी को तो बुलाकर लाई। उसी की हेल्प से तुम्हें जहाँ पर लेकर आई।”

“वह अच्छा लड़का है,” जानवी ने कहा।

“अगर उसने हेल्प की तो वह अच्छा हो गया?”

“रेणुका, तुम इतनी गुस्से में क्यों हो? अब जयराज के किए की सज़ा तुम अनीक को तो नहीं दे सकती।”

“मगर मेरा शादी नाम के विश्वास उठ गया।”

“कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा,” जानवी उसे दिलासा देने लगी क्योंकि उसकी लाइफ में जो हुआ था, वह नहीं चाहती थी कि रेणुका अपनी लाइफ के बारे में गलत सोचें।

ऐसे ही दोनों सहेलियों की रात गुज़र गई थी। अगली सुबह रेणुका का परिवार भी जानवी का पता लेने आ चुका था, मगर जानवी का परिवार से कोई नहीं आया था। उसके दादाजी सुबह 9:00 बजे पहुँचे। वे काफी लेट हॉस्पिटल पहुँचे।

“आप अकेले ही आए हैं दादाजी?” जानवी ने अकेले देखकर पूछा।

“हाँ बेटा, चलो अब घर चलें। मैंने हॉस्पिटल का बिल दे दिया है।”


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