sitaron se aage episode 114

घर का माहौल हल्का-फुल्का था। सब लोग बैठे बातें कर रहे थे। हँसी-मज़ाक भी चल रहा था, लेकिन माहौल के बीच एक ठहराव भी था—जैसे कुछ खास बात होने वाली हो।”मैं सोच रहा हूँ…”, यश ने अचानक कहा। सभी की नज़रें उसकी ओर उठ गईं। “कि मैं दादाजी की पसंद की लड़की से मिलना चाहता हूँ।”कुछ पल के लिए सब चुप हो गए। फिर जय राज मुस्कुरा दिए।”बहुत अच्छा सोचा है बेटा,” राजन ने कहा। “वो मेरे एक पुराने दोस्त की पोती है। बहुत प्यारी लड़की है, सलीकेदार, समझदार।””और सबसे ज़रूरी बात ये है,” जयराज बोले, “कि तुम अपने अतीत से बाहर निकलना चाहते हो। यह अपने आप में एक बड़ी बात है।””तुम बिल्कुल सही फैसला कर रहे हो,” जयराज ने हल्के गर्व से कहा। “मैंने भी डैड की पसंद की लड़की से शादी की थी… और देखो ना, आज मैं कितना खुश हूँ।””डैड को सच में पता होता है कि उनके बच्चों को क्या चाहिए।” जयराज की आवाज़ में तजुर्बे की गरमी थी।युग ने हँसते हुए चुटकी ली। “मगर मॉम तो आपसे अभी तक नाराज़ हैं।””पता है मुझे,” जयराज ने सिर हिलाया। “मगर मैं मना लूँगा अपनी जानवी को।””मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ,” जानवी ने मुस्कुराकर धीरे से कहा।”इसका मतलब ये है कि मॉम आपसे अब भी नाराज़ हैं,” युग ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा।”मुझे लगता है, तुम कभी नहीं चाहते कि मेरी और मॉम की लड़ाई खत्म हो,” जयराज ने हँसते हुए युग से कहा।”बिल्कुल नहीं चाहता,” युग ने मुस्कुरा कर कहा। “मॉम सिर्फ मेरी मॉम हैं, आपका उन पर कोई हक नहीं बनता।”सभी हँसने लगे। जय राज ने कहा, “कोई बात नहीं बच्चों, तुम्हारी शादी हो जाने दो। परी को मैं अपनी साइड कर लूँगा। वह केवल मेरी बेटी होगी।”फिर एक हल्की सी मुस्कान के साथ जय राज हँसने लगे। पूरा हॉल ठहाकों से गूंज गया।उसी समय, यश धीरे से खड़ा हो गया।”आज तो कोई ऑफिस नहीं जा रहा, तो तुम कहाँ जा रहे हो?” जानवी ने पूछा।”नहीं मॉम, मेरा एक ज़रूरी काम है। मुझे ऑफिस जाना ही पड़ेगा।” यश ने संयमित स्वर में कहा।युग, जो अब तक चुप था, उसके पीछे खड़ा हो गया।”सच में ऑफिस जा रहे हो या फिर महक से मिलने?”यश ने बिना झिझक जवाब दिया, “मुझे महक से अब कुछ नहीं कहना। जो करना था, उसने कर लिया। मैं कोई बेवकूफ नहीं हूँ।””मुझे मानना होगा कि मेरे मन में उसके लिए फीलिंग्स थीं,” उसने बिना झिझक स्वीकार किया। “लेकिन जो लड़की मेरे जज़्बातों का इस्तेमाल करना चाहती हो, उसके लिए मैं अपनी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकता।””उसकी बहुत सी बातें तब मुझे समझ नहीं आई थीं, मगर अब समझ आ रही हैं।”जयराज ध्यान से उसे देख रहे थे। जानवी की आँखों में भी संतोष था।”आज यश की बातें बिल्कुल तुम्हारी तरह लग रही हैं,” जानवी ने धीमे से जयराज से कहा। “जैसे वो सिर्फ मेरा ही नहीं, तुम्हारा भी बेटा है।”यश की बात पर पूरा परिवार शांत हो गया, मगर उस ख़ामोशी में सुकून था। सभी को महसूस हुआ कि यश अब पहले जैसा नहीं रहा। वह बड़ा हो गया था, समझदार हो गया था।”मुझे भी जाना चाहिए,” युग ने कहा और उठ खड़ा हुआ।”कहाँ जा रहे हो? तुम्हारे तो ससुराल वाले आज आने वाले हैं,” जयराज ने उसे छेड़ते हुए कहा।”इसीलिए तो जा रहा हूँ। आप सगाई और शादी की तैयारी करवाईए जल्दी से,” युग ने मुस्कुरा कर जवाब दिया।सभी फिर से हँस पड़े। उस कमरे में सिर्फ हँसी नहीं थी, बल्कि अपनेपन और भरोसे की मिठास भी थी। जैसे सब कुछ धीरे-धीरे ठीक हो रहा हो।युग और यश ऑफिस चले गए थे। जूही कॉलेज चली गई। राजन और जया कमरे में विश्राम के लिए चले गए थे। घर में सन्नाटा था, लेकिन सन्नाटे के पीछे कई अनकहे भाव घूम रहे थे।प्रीति और प्रदीप को सुबह ही आ जाना था, मगर प्रदीप को ऑफिस में ज़रूरी काम आ गया था। इस वजह से दोनों अब लंच के समय तक मेंशन पहुँचने वाले थे।जानवी चुपचाप अपने कमरे में दाखिल हुई। वह थकी हुई थी—शारीरिक रूप से नहीं, भावनात्मक रूप से। उसने दरवाज़ा बंद किया ही था कि पीछे से किसी ने उसे पुकारा।”जानू…”वह पलटी। जयराज था। वही आँखें… वही झिझक… वही शिकवा।”आप ऑफिस नहीं गए?” जानवी ने कुछ ठंडे स्वर में पूछा।”नहीं जाना यार, मन ही नहीं लग रहा तुम्हारे बिना,” जयराज उसके पास आकर बैठ गया।जानवी ने नजरें फेर लीं।”मैं जानता हूँ तुम मुझसे नाराज़ हो। लेकिन क्या सच में इतनी दूरी बनानी ज़रूरी थी?” उसके शब्द धीमे और भीगे हुए थे।”मैं नाराज़ नहीं हूँ,” जानवी ने कहा। “बस… चुप हूँ।””जानू, तुम कहो या ना कहो, तुम्हारी आँखें सब बोल जाती हैं। तुम्हारा चेहरा कह रहा है कि तुम ठीक नहीं हो।” जयराज ने उसकी हथेलियाँ थाम लीं।”प्लीज़ माफ़ कर दो। जो हुआ, वो मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती थी। मैं वादा करता हूँ, ऐसी भूल फिर कभी नहीं होगी।””जानवी, जब से तुम मेरी ज़िंदगी में आई हो, मैंने किसी और के बारे में कभी नहीं सोचा। ना कोई और चाहिए, ना चाहूँगा। सिर्फ़ तुम…”वह उसके सामने घुटनों पर बैठ गया। उसकी आँखों में सच्चाई थी। उसका चेहरा शर्म और पछतावे से भरा हुआ था।”उठिए… प्लीज़… आप क्या कर रहे हैं…” जानवी की आवाज़ कांपने लगी।”जानवी… मैं सिर्फ़ तुम्हारा हूँ,” जयराज की आवाज़ में एक टूटापन था।जानवी की आँखों से आँसू बहने लगे। वह पीछे नहीं हटी। जयराज उठ खड़ा हुआ और उसे अपने गले से लगा लिया।उस आलिंगन में कोई परिभाषा नहीं थी—बस दो टूटे हुए दिल एक-दूसरे को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे।कुछ क्षणों तक जानवी चुपचाप उसकी बाँहों में रही। फिर धीरे से बोली:”जब वह वीडियो आया था… और मैंने तुम्हें उस लड़की के साथ देखा था… तो क्या तुम समझ सकते हो कि मैंने उस रात कितना रोई हूँ?”जयराज ने सिर झुका लिया।”हर तस्वीर, हर वीडियो… जैसे मेरी रूह को तोड़ रहे थे,” जानवी की आवाज़ भर्रा गई। “क्यों किया तुमने ऐसा?””जानवी, उस लड़की का नाम दिव्या सेठी है। और जो कुछ तुमने देखा, वो सब उसने जानबूझकर प्लान किया था।””प्रदीप ने सब कुछ ट्रेस कर लिया है। दिव्या सेठी का आदमी हमें फॉलो कर रहा था—उसने हमारी हर मूवमेंट को रिकॉर्ड किया। वो चाहता था कि हमारे बीच दरार आए।””मगर उसने ऐसा क्यों किया?” जानवी अब स्तब्ध थी।”और इसीलिए…” जयराज की आवाज़ टूट रही थी। “…उसने तुम्हारे पास वो वीडियो भेजे, ताकि तुम मुझसे नफरत करने लगो।”जानवी की आँखों में हैरानी थी, दर्द था, और अब थोड़ा पछतावा भी।”काश… काश मैं तुमसे पूछ लेती पहले…” वह धीमे से बोली।”काश मैं भी पहले सब कुछ साफ़ कर देता,” जयराज ने धीरे से कहा। “मगर शायद हमें ये झटका लगना ज़रूरी था, ताकि हम दोनों समझ सकें कि एक-दूसरे की कीमत क्या है।”जानवी ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। यह लम्हा न कोई गिला रहा, न कोई शिकवा… बस प्यार का एक नया आरंभ हुआ।[सीन 4: हवेली का मुख्य दरवाज़ा – घंटी बजती है]दरवाज़े की घंटी बजी। नीचे मौजूद स्टाफ ने आकर बताया कि प्रीति मैम और प्रदीप सर आ गए हैं।जानवी ने अपनी आँखें पोंछीं और मुस्कुराई।”अब चलो… उन्हें देखते हैं,” उसने जयराज से कहा।”मगर अब कभी मत छोड़ना,” जयराज ने उसकी हथेली कसकर पकड़ ली।”अब जब सब जान गए हैं, तो जाने का सवाल ही नहीं,” जानवी ने कहा।


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