सिंघानिया फैमिली लौट आई थी। दिन भर की भागदौड़ और मुलाक़ात के बाद अब घर का सन्नाटा अलग सुकून दे रहा था, मगर मनों के भीतर सवालों की हलचल बाकी थी। बच्चों से तो बात बाद में करनी थी। जानवी और राजन जानते थे कि अभी कुछ भी पूछना जल्दबाज़ी होगी। इसलिए रास्ते भर किसी ने भी उस लड़की का ज़िक्र तक नहीं किया। शायद वे चाहते थे कि जसी खुद अपने दिल से बात करे… ठंडे दिमाग से सोचे… और जब बोले, तो सच बोल सके। यश भी चुपचाप था। वह पूरे रास्ते खिड़की से बाहर देखता रहा। जैसे कोई सोच उसे घेरे हुए हो। शाम होते-होते युग और जय घर लौट आए थे। डिनर के वक़्त पूरी फैमिली एक साथ टेबल पर थी। कमरे में हल्की रौशनी, गर्म खाने की खुशबू और एक अनकहा सा सन्नाटा था। जैसे ही सभी बैठ गए, जय ने एक नज़र सभी पर डाली। फिर उनकी नज़र सीधे यश पर गई। धीरे से मुस्कराते हुए उन्होंने पूछा… “तो बेटा, कैसी लगी तुम्हें वो लड़की?” पूरा कमरा चुप हो गया था। सभी की नज़र अब जसी पर थी। बिलकुल! नीचे मैं आपकी दी हुई कहानी को व्याकरण और भावनात्मक प्रवाह के साथ सहेजकर, थोड़ा विस्तार देकर पेश कर रही हूँ, ताकि पाठक संवादों और सिचुएशन में पूरी तरह डूब सकें: — “मैं शादी के लिए तैयार हूं…” जसी ने सीधा जवाब दिया। उसकी यह बात सुनकर टेबल पर बैठी पूरी सिंघानिया फैमिली कुछ पल के लिए हैरान रह गई। सबकी नज़रें एक साथ उसकी तरफ उठीं। फिर अचानक माहौल में एक हल्की सी खुशी की लहर दौड़ गई। योगराज जी की आंखों में चमक थी, और ममता जी ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखा। “तुम उसे पहले से जानते हो क्या?” जानवी ने उत्सुकता से पूछा। जसी ने बिना देर किए जवाब दिया, “हाँ मॉम, वो मेरे कॉलेज में थी। हम दोनों ने साथ में एमबीए किया था।” जय राज बीच में बोल पड़ा, “ओह तो कोई पुराना क्रश है क्या?” जसी हल्के से मुस्कुराया, “तुम्हें धोखा मत हो जय, मैं तो सिरियस बात कर रहा हूं और तुम मजाक…” जय ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “अरे भाई, मजाक था! लेकिन अब तो लग रहा है बात कुछ ज़्यादा ही दिल से लग गई है।” जसी ने सिर हिलाते हुए कहा, “क्रश नहीं थी वो। सच कहूं तो हमारी आपस में कभी बनी ही नहीं। कॉलेज में तो जैसे जानी दुश्मन थे हम दोनों।” सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे, लेकिन जसी की आवाज़ गंभीर थी। “मगर…” उसने आगे कहा, “वो लड़की बहुत अच्छी है। इस बात में कोई शक नहीं। मैं उसके बारे में बहुत कुछ जानता हूं। उसकी सोच, उसके फैसले, उसके नजरिए — सब कुछ। लेकिन शादी से पहले मैं उसे अपनी ज़िंदगी का हर सच बताना चाहता हूं… अपना पास्ट भी। अगर वो सब कुछ जानने के बाद भी मुझसे शादी करने को तैयार होगी, तब ही मैं इस रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहूंगा।” जय राज ने थोड़ा झुककर पूछा, “मतलब… उसकी लाइफ में कोई और था?” “नहीं,” यश ने तुरंत कहा, “कॉलेज के दौरान तो बिल्कुल नहीं। वो इतनी स्ट्रिक्ट और फोकस्ड थी कि कोई लड़का उसके पास फटक तक नहीं सकता था।” जय फिर मुस्कुरा कर बोला, “मतलब तू तो उसे बहुत डीटेल में जानता है… और अब शादी के लिए भी तैयार है। वाह बेटा!” युग ने बीच में चुटकी ली, “मतलब ये मेरे और परी वाले मामले जैसा है — जो कभी नहीं बने, वही लोग आखिर में शादी कर लेते हैं!” सब हँसने लगे। राजन ने बात को थोड़ा और मजेदार बना दिया, “हां, वही लोग शादी करते हैं जिनकी पहले आपस में बिल्कुल भी नहीं बनती। राजन ने जया की तरफ देखा” जया ने आंखें घुमा कर कहा, “अरे छोड़ो जी, तुम्हारे दादा तो बस हर बात में टांग अड़ाते रहते थे,” जय हँसते हुए बोला, “वैसे मेरी प्रिंसेस कहां है आज? जूही दिखाई नहीं दे रही!”जय राज ने पूछा। “आज उसकी फ्रेंड का बर्थडे है, वहीं गई हुई है। थोड़ी देर में आएगी शायद।” जानवी ने यशस की तरफ प्यार से देखा और कहा, “बेटा, हम सब तुम्हारे फैसले के साथ हैं। मगर जैसा तुमने कहा — पहले उसे सब सच बता देना, ताकि कल को कोई उलझन न रहे। और अगर वो हाँ कहे… तो समझो हमारे घर में फिर से एक नई रौशनी आने वाली है।” यश हल्के से मुस्कुरा दिया। डिनर टेबल पर उस रात बातें हल्की-फुल्की होती रहीं, मगर यश के दिल में कहीं एक गहरी बेचैनी थी। उसका “पास्ट”, जो वह छुपा नहीं सकता था — क्या वह सच लड़की को बताने पर वो भी वही जवाब देगी? – तभी राजन साहब ने जेब से मोबाइल निकाला और किसी को कॉल लगाने लगे। जानवी ने मुस्कराते हुए पूछा, “अब खाना खाते ही किसे फोन कर रहे हैं, डैड?” राजन जी ने गंभीरता से जवाब दिया, “अब जब यश ने ‘हाँ’ कह ही दी है, तो मुझे हरजीत जी को बताना तो पड़ेगा ना… कि हमारा जवाब ‘हाँ’ है। और ये भी पूछना है कि उनकी पोती शिवानी का क्या जवाब है।” यश बीच में बोल पड़ा, “दादू, एक मिनट… पहले आप उन्हें ये ना बताइए कि मेरी तरफ से ‘हाँ’ है। उसके बाद ही उनसे पूछिएगा कि शिवानी ने क्या कहा।” राजन जी मुस्कराए, “ठीक है बाबा, ।” वे कॉल मिलाने ही वाले थे कि तभी उनके मोबाइल स्क्रीन पर ‘हरजीत खन्ना’ का नाम फ्लैश होने लगा। राजन जी ने थोड़ा चौंकते हुए कहा, “अरे! देखो तो सही, हरजीत जी का खुद ही फोन आ गया!” जया ने मुस्करा कर कहा, “लगता है दिलों के तार वाकई जुड़ रहे हैं।” राजन ने बिना देर किए कॉल रिसीव कर लिया और बोले, “हैलो हरजीत जी! नमस्कार!” फोन के दूसरी तरफ कुछ कहा गया, जिसे सुनकर राजन जी का चेहरा हल्का गंभीर और उत्सुक हो गया। उन्होंने जवाब दिया, “अच्छा… सचमुच?” फिर हल्के से मुस्कराए और टेबल पर बैठे सभी की ओर देख कर बोले, “हाँ, बिल्कुल। यश की तरफ से भी यही जवाब है।” पूरा परिवार एक बार फिर मुस्कुरा उठा। अब सबकी नजरें राजन जी पर थीं… शिवानी ने क्या कहा, इसका जवाब सबको जानना था।
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सिंघानिया फैमिली लौट आई थी। दिन भर की भागदौड़ और मुलाक़ात के बाद अब घर का सन्नाटा अलग सुकून दे रहा था, मगर मनों के भीतर सवालों की हलचल बाकी थी। बच्चों से तो बात बाद में करनी थी। जानवी और राजन जानते थे कि अभी कुछ भी पूछना जल्दबाज़ी होगी। इसलिए रास्ते भर किसी…







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