“देखो मॉम…” शिवानी ने एक गहरी साँस ली और दृढ़ स्वर में कहा, “मैं एक बात और साफ़ कर देती हूँ — अगर वहाँ किसी ने पैसे, शो-ऑफ या स्टेटस का दिखावा किया, तो मैं बर्दाश्त नहीं करूँगी।” उसकी माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अरे इतनी जल्दी मत सोचो। मुझे तो तुम्हारी सास बहुत ही अच्छी लगीं। बहुत प्यार से देख रही थीं तुम दोनों को… ख़ास तौर पर तुम्हें।” शिवानी की आँखों में हल्की मुस्कान उभरी। “ठीक है मॉम। कल ही पता चल जाएगा कि वो लोग असल में कैसे हैं।” — अगली सुबह… सुबह-सुबह हरजीत खन्ना को राज का फोन आया। राजन ने बताया कि यश, शिवानी को लेने आ रहा है। लेकिन हरजीत ने मना कर दिया। “शिवानी खुद आ रही है,” उन्होंने कहा। “उसे पहले थोड़ा काम है, फिर वो वहीं पहुँच जाएगी।” असल में, शिवानी ने पहले ही अपने दादाजी से कह दिया था — “अगर वहाँ से कोई गाड़ी आए तो आप मना कर देना, मैं खुद चली जाऊँगी।” दादाजी जानते थे कि यह उसकी आदत है — अपनी शर्तों पर जीने की। इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा और उसकी बात मान ली। — स्कूटी से उतरते हुए उसने एक बार गहरी सांस ली। मॉल के अंदर घुसते ही उसके चेहरे पर हल्की सी उलझन थी। ‘कहाँ जाना है?’ उसे सिर्फ मॉल का नाम बताया गया था — न दुकान का नाम, न फ्लोर। ‘काश, मेरे पास उसका नंबर होता।’ वह बाहर खड़ी होकर यही सब सोच ही रही थी, तभी एक आवाज़ आई — “चले, शिवानी?” वह चौंकी। साइड में देखा — यश खड़ा था। “तुम?” “मैं तुम्हारी ही वेट कर रहा था। मुझे कहा गया था कि मैं तुम्हें लेकर आऊँ।” शिवानी ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, चलो।” वे दोनों लिफ्ट की तरफ़ बढ़े। — लिफ्ट में… लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही यश ने बिना भूमिका के सवाल कर डाला — “तुम शादी के लिए कैसे मान गई?” शिवानी ने बिना झिझक के जवाब दिया, “यही सवाल तो मुझे तुमसे करना है — तुम कैसे मान गए? मुझे लगा था, तुम तो साफ़ मना कर दोगे। इसलिए मैंने ज़्यादा सोचे बिना हाँ कह दी।” यश की आँखों में एक संजीदगी थी। “मैंने तो सोचकर हाँ की है।” “क्यों?” शिवानी ने हल्के आश्चर्य से पूछा। “क्योंकि मुझे आगे बढ़ना है, ज़िंदगी को सही दिशा देनी है। और मैं तुम्हें जानता हूँ, थोड़ा-बहुत तो समझता हूँ… इसलिए लगा कि शायद तुम मेरे लिए ठीक रहोगी।” शिवानी ने कुछ नहीं कहा — सिर्फ उसकी तरफ देखा। लिफ्ट अब टॉप फ्लोर पर पहुँच चुकी थी। — डिज़ाइनर स्टूडियो के बाहर… उनके सामने वह बुटीक था, जहाँ फेमस डिज़ाइनर का अपॉइंटमेंट बुक था। शिवानी ने धीरे से कहा, “ठीक है, हम बाद में इस पर बात करेंगे।” “ज़रूर,” यश ने कहा और दरवाज़ा खोला। — बुटीक के अंदर… शिवानी जैसे ही बुटीक के अंदर दाखिल हुई, उसकी नज़र एक कोने में खड़े जानवी और जयराज पर पड़ी। जानवी मुस्कुरा रही थी और जयराज एक सुंदर सी ड्रेस पर लगे टैग को ध्यान से पढ़ रहे थे। जानवी ने जय को देखकर, हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मैं अपने लिए नहीं… अपनी बहुओं के लिए ड्रेस देखने आई हूँ।” जय ने मज़ाकिया अंदाज़ में पूछा, “बहू ओं के लिए? तुम्हारे बेटे हैं — वो खुद ही सिलेक्ट कर लेंगे।” जानवी की मुस्कान थोड़ी गहरी हो गई। “तो क्या… आप मेरे लिए आए हैं?” जयराज ने मुस्कराते हुए एकदम साफ़ जवाब दिया, “हां, तुम्हारे लिए ही आया हूँ। कुछ मन किया कि इस बार फैमिली के साथ थोड़ा वक़्त बिताया जाए, और यह मौका अच्छा लगा।” जय राज की बात सुनकर जानवी की आंखों में थोड़ी चमक आ गई। वो जानती थी कि रिश्तों की मिठास शब्दों में नहीं, एहसासों में होती है। — तभी… एक साइड जूही उत्साह में ड्रेस उठाकर बोल पड़ी, “बताइए न, ये ड्रेस मुझ पर कैसी लगेगी?” जय राज ने बिना देखे सीधा कहा, “बिल्कुल बेकार।” शिवानी अब तक उनके पास पहुँच चुकी थी जानवी ने मुस्कराते हुए कहा, “युग परी को लेने गया है, और अब तक वापस नहीं आया।” यश ने कहा, “ठीक है, मैं फोन करता हूँ भाई को।” वह फोन निकालते हुए बोला, “वैसे आजकल प्रीति मौसी ने उन्हें मिलने से मना किया है… तो वो दोनों इस मौके का थोड़ा-सा फ़ायदा तो उठा ही सकते हैं।” उसकी बात पर सभी हल्के से मुस्कुरा उठे। — शिवानी और जानवी… शिवानी अब जाकर जानवी के पास खड़ी हो गई थी। जानवी ने उसे देखकर बाँहें फैला दीं, “अरे बेटा, नहीं… पहले तो एक बार गले लगाओ!” शिवानी हँसते हुए झिझकी, लेकिन फिर जाकर उसे गले लगा लिया। जानवी के बाद जयराज ने भी उसे अपने पास बुलाया और प्यार से गले लगाया। “वैसे हम दोनों मिले नहीं हैं… मैं यश का डैड हूँ,” उन्होंने गर्व के साथ कहा, शिवानी मुस्कुरा दी। ये गर्मजोशी उसके मन को थोड़ी राहत दे रही थी। “बच्चों, अब तुम अपनी ड्रेस सिलेक्ट करो,” जयराज ने कहा, “मैं देखता हूँ तुम्हारी माँ के लिए कोई अच्छी सी ड्रेस।” वह एक साइड चले गए जहाँ डिज़ाइनर आउटफिट्स हेंगर्स पर टंगे हुए थे। हर ड्रेस को वे बड़े ध्यान से देख रहे थे, जैसे सिर्फ कपड़ा नहीं, रिश्ता चुन रहे हों। शिवानी वहीं खड़ी, एक पल के लिए सबको निहार रही थ — थोड़ी ही देर में… युग और परी भी वहाँ पहुँच चुके थे। दोनों की एन्ट्री के साथ माहौल में एक नई सी रौनक आ गई थी। जैसे ही उन्होंने शिवानी को देखा, दोनों बहुत प्यार से उससे मिले। शिवानी हल्के से मुस्कुरा दी। उसे महसूस हो रहा था कि ये लोग जितने खुले दिल वाले हैं, उतनी ही अपनापन भरी गर्मी उनके व्यवहार में भी है। — अब सब साथ मिलकर ड्रेस देख रहे थे। शिवानी, जूही और परी एक-दूसरे को लगातार नए-नए डिज़ाइन दिखा रही थीं। जूही कभी कोई अनारकली उठाती, तो परी बिना रुके बोलती चली जाती — “ये कलर मुझ पर अच्छा लगेगा… नहीं नहीं, ये वाला बहुत ओवर हो जाएगा, ये देखो!” शिवानी, जो आम तौर पर शांत और अपने में रहने वाली लड़की थी, आज चुपचाप सही, लेकिन मुस्कुरा रही थी। उसे यह सब अच्छा लग रहा था। शायद यह पहली बार था जब उसे किसी नए परिवार में अजनबी जैसा महसूस नहीं हो रहा था। — तभी… यश एक साइड से एक लहंगा उठाकर लाया — पिस्ता ग्रीन कलर का, हल्के व्हाइट वर्क वाला लहंगा। उसके साथ डार्क मैजेंटा रंग का दुपट्टा था — दुपट्टे पर भी बारीक कढ़ाई का खूबसूरत काम था। यश ने लहंगा शिवानी के सामने रखते हुए कहा, “मुझे लगता है… ये तुम्हारी पसंद के हिसाब से ठीक रहेगा। सादा, लेकिन क्लासी। और कलर भी तुम्हारे टोन पर बहुत अच्छा लगेगा।” शिवानी ने चुपचाप उसकी ओर देखा — उसकी आँखों में सवाल नहीं, बल्कि एक हल्की सी स्वीकृति थी। उसने धीमे स्वर में कहा, “सच में… ये काफ़ी अच्छा लग रहा है।” यश मुस्कुरा दिया। बाकियों ने भी सहमति में सिर हिलाया। जूही ने चुटकी ली, “वाह भाभी, लगता है भाई आपकी चॉइस समझने लगे हैं!” शिवानी कुछ नहीं बोली — सिर्फ मुस्कुरा दी। उस दिन पहली बार, उसे अपने होने वाले रिश्ते में थोड़ी सी सहजता महसूस हुई थी… जैसे कोई अनजाना रिश्ता धीरे-धीरे अपना होने लगा हो। परी और शिवानी — दोनों ने अपनी सगाई के लिए ड्रेस सिलेक्ट कर ली थी। शिवानी के साथ जूही और परी भी थीं, जिन्होंने बड़ी उत्सुकता और प्यार से उसके लिए विकल्प देखे थे। जयराज ने जानवी ड्रेस के लिए पहले ही पसंद कर ली थी थी, ड्रेस की खरीदारी पूरी होने के बाद, सब ज्वेलरी सेक्शन की ओर बढ़े। शिवानी और परी की सगाई के लिए जो ज्वेलरी पसंद की गई, वह पारंपरिक और बेहद खूबसूरत थी। जानवी ने खुद उसकी पसंद का ख्याल रखते हुए हर एक पीस बड़ी बारीकी से चुना। इस तरह सारी खरीदारी करते-करते कब शाम हो गई, किसी को पता ही नहीं चला। — रेस्टोरेंट में साथ का समय… जैसे ही सभी लोग फुर्सत में आए, जयराज ने चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए कहा, “चलो, अब कुछ खाते हैं। बहुत थक गए हैं सब — बैठकर थोड़ी देर सुकून से बातें भी हो जाएँगी।” सभी ने सहमति में सिर हिलाया। मॉल के ही एक साइड पर सुंदर सा रेस्टोरेंट था — आरामदायक और शांत माहौल वाला। वहीँ सब लोग साथ चल दिए। रेस्टोरेंट में बैठते ही किसी ने पानी माँगा, तो किसी ने चाय या कॉफी का ऑर्डर दे दिया। दिनभर की हलचल के बाद अब सब थोड़ा खुलकर बातें कर पा रहे थे।


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“देखो मॉम…” शिवानी ने एक गहरी साँस ली और दृढ़ स्वर में कहा, “मैं एक बात और साफ़ कर देती हूँ — अगर वहाँ किसी ने पैसे, शो-ऑफ या स्टेटस का दिखावा किया, तो मैं बर्दाश्त नहीं करूँगी।” उसकी माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अरे इतनी जल्दी मत सोचो। मुझे तो तुम्हारी सास…

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